ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने चुनाव में जीत दर्ज कर एक बार फिर सत्ता में वापसी की है. उनकी इस जीत पर कांग्रेस सांसद और पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर भी गदगद नजर आए. उन्होंने सोशल मीडिया पर लूला की जीत को ब्राजील की जनता की ताकत का संदेश बताया. थरूर के मुताबिक मजदूरों और गरीबों के हक की बात करने वाले लूला की वापसी से सामाजिक न्याय और गरीबी के खिलाफ लड़ाई को नई ऊर्जा मिल सकती है. इस नतीजे का असर सिर्फ ब्राजील की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाने वाले राजनीतिक खेमे के लिए भी इसे बड़ा झटका माना जा रहा है.
ब्राजील के चुनाव में लूला का मुकाबला दक्षिणपंथी नेता फ्लावियो बोल्सोनारो से था. वह पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं. चुनावी मुकाबला दोनों नेताओं की नीतियों और विदेश संबंधों को लेकर भी अहम था. फ्लावियो ने अमेरिका के साथ करीबी रिश्ते बनाने और ट्रंप प्रशासन के साथ बेहतर समझौते करने का वादा किया था. वहीं लूला अमेरिकी टैरिफ नीतियों की आलोचना करते रहे हैं. थरूर ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि यह जीत ब्राजील की स्वतंत्र विदेश नीति और बहुध्रुवीय दुनिया के विचार को मजबूत कर सकती है. इससे वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में ब्रिक्स की भूमिका पर भी असर पड़ सकता है.
शशि थरूर ने लूला की जीत पर लिखा कि फैक्ट्री के फर्श से वैश्विक मंच तक पहुंचने वाले नेता की यह ऐतिहासिक जीत याद दिलाती है कि ब्राजील की असली ताकत वहां के लोगों में है. थरूर ने लूला को मजदूर वर्ग और गरीबों का मजबूत समर्थक बताया. उनके मुताबिक लूला की सत्ता में वापसी से सामाजिक समावेशन और आर्थिक न्याय को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. गरीबी के खिलाफ लड़ाई को भी इससे नई गति मिल सकती है.
ब्रिक्स और वैश्विक दक्षिण को मिल सकती है मजबूती
थरूर ने लूला की जीत का महत्व ब्रिक्स के संदर्भ में भी बताया. उनका मानना है कि लूला के नेतृत्व में ब्राजील बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की नीति पर और मजबूती से आगे बढ़ सकता है. इसका मतलब है कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में किसी एक ताकत का दबदबा न हो बल्कि अलग-अलग देशों और समूहों की भी प्रभावी भूमिका रहे. थरूर के मुताबिक ब्राजील का यह रुख ब्रिक्स को वैश्विक दक्षिण की एक अहम आवाज के रूप में मजबूत कर सकता है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक शासन व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ सकता है.
ट्रंप के लिए कैसे बढ़ सकती है चुनौती?
चुनाव का एक अहम पहलू अमेरिका के साथ ब्राजील के रिश्ते हैं. फ्लावियो बोल्सोनारो ने वाशिंगटन के साथ करीबी संबंधों और ट्रंप प्रशासन से बेहतर समझौते करने का वादा किया था. इसके उलट लूला अमेरिकी व्यापार नीतियों और ब्राजील के निर्यात पर लगाए गए टैरिफ की आलोचना करते रहे हैं. थरूर ने भी कहा कि वाशिंगटन ने लूला के प्रतिद्वंद्वी का खुलकर समर्थन किया था. ऐसे में लूला की जीत को ट्रंप के सहयोगी खेमे के लिए राजनीतिक झटके के तौर पर देखा जा सकता है. हालांकि इससे अमेरिका और ब्राजील के संबंधों पर कितना असर पड़ेगा यह आने वाले समय में साफ होगा.
टैरिफ और राष्ट्रीय संप्रभुता पर रहेगी नजर
थरूर के मुताबिक दोनों देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक खींचतान जारी रह सकती है. व्यापार और टैरिफ से जुड़े विवाद इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं. लूला की विदेश नीति में ब्राजील के राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता को प्राथमिकता मिलने की उम्मीद है. यानी उनके नेतृत्व में सरकार बाहरी दबाव के बजाय अपने देश के हितों के आधार पर फैसले लेने पर जोर दे सकती है. इससे अमेरिका के साथ बातचीत और व्यापारिक रिश्तों का रुख महत्वपूर्ण होगा.
लैटिन अमेरिका की राजनीति में बड़ा संदेश
थरूर ने लूला की जीत को सामाजिक प्रगति और लोकतांत्रिक मजबूती के समर्थन के रूप में देखा. लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव के बीच यह नतीजा खास महत्व रखता है. चुनाव में जीत के बाद ब्राजील में वामपंथी नेतृत्व बना रहेगा. लूला इससे पहले 2003 से 2010 तक देश के राष्ट्रपति रह चुके हैं. इस बार उनकी वापसी को सामाजिक कल्याण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की राजनीति के लिए अहम माना जा रहा है. थरूर ने इसे ऐसा नतीजा बताया जिसकी उम्मीद कई लोगों को नहीं थी. अब नजर इस बात पर रहेगी कि लूला घरेलू चुनौतियों और अमेरिका के साथ संबंधों को किस तरह संभालते हैं.



