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कांग्रेस का आपातकाल लोकतंत्र का गला घोंटने वाला ‘संविधान हत्या दिवस’ – दीपक म्हस्के…

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आपातकाल के 50 वर्ष : जिला भाजपा कार्यालय में हुई प्रेस वार्ता, कांग्रेस की तानाशाही मानसिकता पर बरसे भाजपा प्रवक्ता

राजनांदगांव (दावा)। देश में इंदिरा गांधी के शासनकाल में लगाए गए आपातकाल (इमरजेंसी) और मीसा कानून के काले इतिहास को याद करते हुए भाजपा ने इसे स्वतंत्र भारत में संविधान की हत्या और लोकतंत्र का सबसे काला दिवस करार दिया है। 25 जून 1975 को कांग्रेस सरकार द्वारा देश पर थोपे गए इस काले कानून के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर जिला भाजपा कार्यालय में एक विशेष प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया।
प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए भाजपा प्रवक्ता दीपक म्हस्के ने कहा कि 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक के 21 महीनों की अवधि स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे अलोकतांत्रिक और दमनकारी काल था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इशारे पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी। इस दौरान चुनाव स्थगित कर दिए गए और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को पूरी तरह समाप्त कर मनमानी की गई। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इसे ‘भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि’ कहा था।

सत्ता जाने के डर से आधी रात को देश को झोंका गुलामी में
भाजपा प्रवक्ता ने इमरजेंसी की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि विगत चुनाव में इंदिरा गांधी के प्रतिद्वंदी रहे राजनारायण जी की चुनाव याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब श्रीमती गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया, तो उनके हाथ से सत्ता खिसकती नजर आई। अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने 25 जून 1975 की आधी रात को देश में आपातकाल लागू करवा दिया। आपातकाल घोषित होते ही देश भर में स्वयंसेवकों और गैर-कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारियों और बर्बर प्रताडऩा का सिलसिला शुरू हो गया। लाखों देशवासियों ने सत्याग्रह कर जेलें भर दीं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, के.आर. मलकानी, जॉर्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रामविलास पासवान, शरद यादव और रामबहादुर राय समेत अविभाजित मध्यप्रदेश और देश भर के हजारों शीर्ष नेताओं को जेल में ठंस दिया गया। दीपक म्हस्के ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि दशकों से हमें ‘सेक्युलरिज्म’ (पंथनिरपेक्षता) और ‘सोशलिज्म’ (समाजवाद) जैसे शब्दों से डराने की कोशिश की जाती है। जबकि सच यह है कि ये दोनों शब्द मूल संविधान का हिस्सा थे ही नहीं। आपातकाल में जब सारी ताकतें एक तानाशाह के हाथ में केंद्रित थीं और न्यायपालिका व संसद निष्प्रभावी थे, तब इन दोनों शब्दों को चुपके से संविधान की प्रस्तावना में डाला गया। उन्होंने बताया कि इस दौरान मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी को कुचल दिया गया। इमरजेंसी लागू होते ही अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई। देश भर में 3801 अखबारों को जब्त किया गया और 327 पत्रकारों को मीसा कानून के तहत जेल भेजा गया।

सरकार के खिलाफ लिखने वाले 290 अखबारों के सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन के ‘द टाइम्स’ और ‘द गार्डियन’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के संवाददाताओं को भारत से निष्कासित कर दिया गया तथा रॉयटर्स जैसी न्यूज एजेंसियों के टेलीफोन काट दिए गए। श्री म्हस्के ने विपक्षी दलों और कांग्रेस शासित राज्यों के हालिया उदाहरण देते हुए कहा कि असहमति की आवाज को दबाना और सत्ता का दुरुपयोग करना कांग्रेस की मूल वृत्ति रही है। चाहे महाराष्ट्र में पूर्व में पत्रकारों और अभिनेत्रियों के साथ हुआ बर्बर रवैया हो, या पश्चिम बंगाल में जारी राजनीतिक हिंसा, ये तमाम चीजें आपातकाल वाली मनोवृत्ति का ही हिस्सा हैं। उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों का उदाहरण देते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर महज एक ट्वीट या रीट्वीट करने पर पुलिस का खौफ दिखाना और पत्रकारों पर सैकड़ों मुकदमे दर्ज करना यह साबित करता है कि कांग्रेस आज भी उसी तानाशाही मानसिकता से ग्रसित है। प्रेस वार्ता के अंत में भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि आज वर्ष 2026 में हम जिस आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, वह हमने कांग्रेस की तानाशाही से लडक़र दोबारा हासिल की है। अंग्रेजों से मिली पहली आजादी को कांग्रेस ने 1975 में छीन लिया था। यह दूसरी आजादी अटल जी, आडवाणी जी, नानाजी देशमुख और लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे राष्ट्रवादियों के त्याग और बलिदान की देन है। उन्होंने नई पीढ़ी से आह्वान किया कि वे कांग्रेस की इस विभाजनकारी ‘बांटो और राज करो’ की नीति के प्रति हमेशा सतर्क रहें क्योंकि आपातकाल भले ही 1977 में खत्म हो गया, लेकिन वैसी मानसिकता वाले तत्व आज भी सक्रिय हैं।

इस महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता के दौरान सांसद प्रतिनिधि हरीश शर्मा, मीडिया प्रभारी अमर ललवानी, तरुण लहरवानी, रूपचंद भीमनानी, मनोज निर्वाणी, आशुतोष सिंह चंदेल, समीर श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में भाजपा पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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