शेयर बाजार में रिकॉर्ड तेजी के इस दौर में कमाई करना जितना रोमांचक है, टैक्स सीजन आते ही उसका हिसाब-किताब रखना उतना ही पेचीदा हो जाता है. बहुत से निवेशक शेयर या म्यूचुअल फंड बेचकर मुनाफा तो कमा लेते हैं, लेकिन टैक्स लायबिलिटी (कर देनदारी) का सही अंदाजा न होने के कारण वे आखिरी वक्त पर गलती कर बैठते हैं. इनकम टैक्स विभाग के नियमों के तहत, इक्विटी शेयर्स और इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड्स से होने वाले मुनाफे को होल्डिंग पीरियड (यानी आपने उसे कितने समय तक अपने पास रखा) के आधार पर दो हिस्सों शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स में बांटा जाता है.
इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय इस मुनाफे को छुपाना या आम आमदनी के साथ मिला देना आपको भारी मुसीबत में डाल सकता है. सैलरीड क्लास के जो लोग आमतौर पर ITR-1 फाइल करते हैं, वे अगर शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड से कमाई करते हैं, तो उनके लिए ITR-2 फॉर्म भरना अनिवार्य हो जाता है. इस फॉर्म के भीतर कैपिटल गेन्स के लिए एक खास शेड्यूल दिया गया होता है, जहां आपको अपनी हर एक सेल ट्रांजैक्शन और मुनाफे की कूट-कूट कर सटीक जानकारी देनी होती है, ताकि टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से कोई स्क्रूटनी नोटिस न आए.



