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अंग्रेजी के बिना भी बन सकते हैं डॉक्टर-इंजीनियर, हिंदी में होने लगी है MBBS-BTech की पढ़ाई

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कुछ साल पहले तक यह सोचना भी मुश्किल था कि अंग्रेजी के बिना तकनीकी विषयों की पढ़ाई हो सकती है. स्कूल की पढ़ाई मातृभाषा में हो जाती थी. लेकिन जब बात मेडिकल यानी एमबीबीएस या इंजीनियरिंग यानी बीटेक की आती थी तो अंग्रेजी के कठिन तकनीकी शब्द मुश्किल बढ़ा देते थे. छोटे शहरों या ग्रामीण इलाकों के कई मेधावी स्टूडेंट्स अंग्रेजी माध्यम के माहौल में असहज महसूस करते थे और इसलिए पीछे छूट जाते थे.
टेक्निकल एजुकेशन का भाषाई बैरियर हमेशा से बड़ी चुनौती बना हुआ था. इससे कई प्रतिभाशाली दिमाग आगे नहीं बढ़ पाते थे. लेकिन अब वक्त बदल रहा है. देश के कई टॉप संस्थानों में एमबीबीएस और बीटेक की पढ़ाई हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी होने लगी है. ज्ञान की भाषा कभी भी किसी की प्रतिभा को तोलने का पैमाना नहीं बननी चाहिए. मध्य प्रदेश से शुरू हुई इस पहल ने उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और बिहार तक अपनी जड़ें जमा ली हैं. हिंदी दिवस पर जानिए, इससे बच्चों को कैसे फायदा मिलेगा.

बीटेक और एमबीबीएस की पढ़ाई हिंदी में क्यों जरूरी?
टेक्निकल एजुकेशन में भाषाई बदलाव का उद्देश्य सिर्फ भाषा बदलना नहीं है. यह देश के हर कोने के बच्चे को उसकी अपनी भाषा में बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देना है. इससे अंग्रेजी की कमजोरी किसी की सफलता के आड़े नहीं आएगी.

पहले मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई का मतलब अंग्रेजी की मोटी-मोटी किताबें रटना हुआ करता था. स्टूडेंट्स अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों में उलझकर रह जाते थे. इससे कई बार विषय की असली समझ पीछे छूट जाती थी. अब जब शिक्षा मातृभाषा (हिंदी) में उपलब्ध हो रही है तो चीजों को समझना और उन्हें प्रैक्टिकल रूप से सोचना बहुत आसान हो गया है. जब कोई स्टूडेंट एनाटॉमी या बेसिक इंजीनियरिंग के कॉन्सेप्ट अपनी मातृभाषा में पढ़ता है तो उसका कॉन्फिडेंस कई गुना बढ़ जाता है
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एआईसीटीई (AICTE) और नेशनल बुक ट्रस्ट का बड़ा कदम
इस बदलाव को जमीन पर उतारने में एआईसीटीई (AICTE) और नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) की भूमिका बेहद अहम रही है. इन संस्थानों ने मिलकर मेडिकल और इंजीनियरिंग के पहले और दूसरे वर्ष की स्टैंडर्ड किताबों को हिंदी में तैयार करवाया है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई इंजीनियरिंग कॉलेज और NITs में अब सुविधा के अनुसार हिंदी या अंग्रेजी माध्यम चुनने का विकल्प मिलने लगा है. इससे न सिर्फ उच्च शिक्षा में ड्रॉपआउट रेट कम हो रहा है, बल्कि हिंदी पट्टी वालों के लिए सफलता के नए दरवाजे भी खुल रहे हैं.

ग्लोबल मार्केट की जरूरतें और प्रैक्टिकल बैलेंस
मातृभाषा में पढ़ाई का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अंग्रेजी की अब कोई जरूरत ही नहीं है. तकनीकी शिक्षा और रिसर्च के क्षेत्र में आज भी ग्लोबल लेवल पर काम करने के लिए अंग्रेजी की बेसिक समझ बेहद जरूरी है. इसीलिए ज्यादातर तकनीकी संस्थानों में इसे ‘ऑप्शन’ के रूप में रखा गया है. स्टूडेंट्स अपनी मातृभाषा में कॉन्सेप्ट्स को आसानी से समझ सकते हैं और साथ ही प्रोफेशनल दुनिया के लिए अंग्रेजी शब्दावली से भी तालमेल बिठाते हुए आगे बढ़ रहे हैं.