सरकार की ओर से मर्चेंट यूपीआई पेमेंट्स पर शुल्क लगाने की नई घोषणा के बाद सियासी पारा चढ़ गया है. संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की ताजा बैठक में विपक्षी नेताओं ने इस कदम को बेहद जनविरोधी बताया. उनका कहना है कि इस फैसले से देशभर के करोड़ों आम नागरिकों और छोटे दुकानदारों की कमर टूट जाएगी. 2000 रुपये से ऊपर के मर्चेंट पेमेंट्स पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर तय होने से पूरे देश में नाराजगी है. बैठक में सिर्फ यूपीआई ही नहीं, बल्कि जीडीपी ग्रोथ के हालिया आंकड़ों की विश्वसनीयता और वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के रेगुलेशन पर भी बहस देखने को मिली.
यूपीआई ट्रांजैक्शन पर क्यों मचा सियासी घमासान?
संसद की वित्त समिति की बैठक भले ही दूसरे एजेंडे पर बुलाई गई थी, लेकिन विपक्षी सांसदों ने यूपीआई चार्ज का मुद्दा प्रमुखता से उठा दिया. आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने सरकार के इस कदम को सीधे तौर पर आम जनता के खिलाफ साजिश करार दिया. उन्होंने जोर देकर कहा कि 2000 रुपये से अधिक के हर पेमेंट पर चार्ज लगना हर घर के बजट पर असर डालेगा. कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा, ‘पूरे देश में लेनदेन शुल्क को लेकर गहरी चिंता और गुस्सा है.’ उन्होंने साफ किया कि जनता के दर्द का असर संसदीय चर्चाओं में दिखना स्वाभाविक है. समिति के अध्यक्ष भर्तृहरि महताब ने माना कि यह मुद्दा तय कार्यसूची में नहीं था, मगर सदस्यों की भारी चिंता को देखते हुए अगली समिति में इस पर व्यापक चर्चा संभव है.
सरकार की नई नीति के तहत जनवरी 2020 से जारी जीरो-एमडीआर व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है. बैंक और फिनटेक कंपनियां लंबे समय से इस फ्री सर्विस का विरोध कर रही थीं. नए नियमों के मुताबिक 2000 रुपये से अधिक के मर्चेंट भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगेगा. इसमें अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है, जो 75,000 रुपये या उससे ज्यादा के भुगतान पर लागू होगी. यह नया नियम 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने जा रहा है. हालांकि यह शुल्क व्यापारियों के खाते से कटेगा, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसका अंतिम बोझ घुमा-फिराकर ग्राहकों पर ही डाला जाएगा.
क्या खुद की ही समिति की रिपोर्ट भूल गए राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद?
यूपीआई शुल्क पर मचे इस घमासान में अब नया मोड़ आ गया है. सरकारी सूत्रों के अनुसार वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने खुद 2026 में यूपीआई के लिए टियर्ड एमडीआर व्यवस्था की जोरदार वकालत की थी. समिति ने इस फ्रेमवर्क को बिना किसी देरी के नोटिफाई और लागू करने की सिफारिश की थी. 12 अगस्त को जब यह रिपोर्ट सर्वसम्मति से स्वीकार की गई, तब पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ जैसे दिग्गज कांग्रेस सांसद बैठक में मौजूद थे. आधिकारिक मिनट्स के मुताबिक किसी भी सदस्य ने इस पर कोई असहमति दर्ज नहीं कराई थी. ऐसे में सवाल उठता है कि जिस फैसले पर खुद कांग्रेस के दिग्गजों ने संसद में मुहर लगाई थी, उस पर राहुल गांधी और पार्टी बाहर सियासी बवाल क्यों खड़ा कर रहे हैं.
क्या जीडीपी के विकास आंकड़ों में हुआ है खेल?
संसदीय बैठक में केवल यूपीआई पर ही तकरार नहीं हुई, बल्कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में दर्ज 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ रेट पर भी सवाल उठे. सांसद मनीष तिवारी ने सरकार से मांग की कि वह जीडीपी कैलकुलेशन का फॉर्मूला पूरी तरह पारदर्शी करे. उन्होंने सवाल उठाया कि आधार वर्ष बदलने के बाद कौन से नए इंडेक्स जोड़े गए और कौन से पुराने इंडिकेटर्स हटा दिए गए. विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार आंकड़ों के साथ बाजीगरी कर रही है, जिससे असल जमीनी हकीकत छिप रही है.
बैठक का एक और अहम पहलू वर्चुअल डिजिटल एसेट्स यानी क्रिप्टोकरेंसी जैसे टूल्स का भविष्य रहा. समिति पिछले एक साल से आरबीआई और सीबीडीटी जैसे शीर्ष संस्थानों के साथ इस पर विचार कर रही है. चेयरमैन महताब ने रेखांकित किया कि सरकार इन एसेट्स को मान्यता भी नहीं दे रही और न ही कड़ा रेगुलेशन बना रही है. बिना किसी स्पष्ट नियम के यह ग्रे-मार्केट कई तरह की संदिग्ध गतिविधियों का केंद्र बन रहा है, जिससे वित्तीय सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है.



