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चमत्कार और नमस्कार तो एक दूसरे के पूरक हैं

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ये दुनिया… ये महफिल… मेरे काम की नहीं, मेरे काम की नहीं… एक समय यह था कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी ऐसा गाना गाकर अपना दु:ख व्यक्त करते थे। वह तो 15 साल की सत्ता में हुवे भ्रष्टाचार के जरिए स्वविकास में व्यस्त मंत्रियों से त्रस्त जनता में सत्ता विरोधी लहर के चलते भाजपा को विधानसभा चुनाव में शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था। जिसका बड़ा फायदा स्वाभाविक रूप से कांग्रेस को मिला, चम्पक ने कहा।

देख चम्पक, इसमें भाजपा के एक असंतुष्ट वरिष्ठ नेता के विभीषण भूमिका में रहने की भी चर्चा खूब हो रही है। लम्बे अरसे से सुबे का मुखिया बनने की तीव्र महत्वाकांक्षा राजनीति का हर दांव आजमाने मजबूर कर देती है। यूं भी यह नेता खुद ही चलती फिरती पार्टी से कम नहीं हैं। अपने हजारों समर्थकों में लोकप्रिय और दबंगता में भरोसा रखने वाले ये नेता यूं तो कांग्रेस सरकार में विपक्ष में हंै किन्तु सत्ता सदृश्य सुख वे वर्तमान में भी भोग रहे हैं। सत्ता समय प्राप्त मंत्री बंगले का उपभोग वर्तमान में भी करते हुवे बड़ी दबंगई से जनता का काम कर रहे हैं। सत्तासीन मंत्री का काम भ्रष्ट सिस्टम के चलते एक बार नहीं होगा किन्तु ‘भैया’ कहलाने वाले इन नेता का काम अफसरान फोन पर निर्देश मिलते ही कर देते हैं।

ऐसे समय लोगों को अति प्रभावशाली दीर्घ राजनैतिक अनुभव वाले स्व. विद्या भैया की छवि भाजपा के इन भैया में दिखाई दे रही है। बिरजू भैया फिर केन्द्र का कोई काम हो या छत्तीसगढ़ का, हर छोटा-बड़ा काम नौकरशाहों से करवाने में सक्षम हैं। उनके बंगले में लोगों, अफसरों के जाने-आने का सिलसिला अनवरत रहता है। इससे उनकी लोकप्रियता, दबंगई कूटनीति का अनुमान लगाया जा सकता है। कांग्रेस के अनेक मंत्रियों से मधुर संबंध होने के चलते भी अपने सत्ताकाल के दौरान हुए भ्रष्ट काण्ड की फाईल भी धुल खाते पड़ी है।

राजनीति में चमत्कार तो होते ही रहते हैं। कोई भाजपा में शामिल होकर सत्ता भोगता है, तो इसे चमत्कार नहीं कहना चाहिए किन्तु, कोई विपक्ष का विधायक शासक पार्टी से हनीमून कर सत्ता सुख भोगे, वास्तव में ये चमत्कार होता है तो यह एक अच्छी बात है। नमस्कार का अस्तित्व टिकाए रखने भी चमत्कार को बनाए रखना पड़ता है। कहीं नमस्कार से चमत्कार के दर्शन होते हैं तो कहीं चमत्कार देखकर नमस्कार होते हैं। चमत्कार और नमस्कार तो एक दूसरे के पूरक ही हैं।

कोरोना से तो राहत किन्तु व्यापारियों की दिक्कतें कम नहीं होने वाली
कोरोना ने व्यापार-उद्योगों को भी वाट लगाया है। महंगाई मुस्कुरा रही है। व्यापारी भी बार-बार बदलते नियमों से त्रस्त हैं। बैंकों के ट्रांजेक्शन में बदले नियमों से व्यापारियों की परेशानी बढऩी ही है। एक जुलाई से बदल चुके नियमों से भी उनका व्यापार प्रभावित होगा। अब 15 जुलाई से टी सी एस, टीडीएस के नए नियम से व्यापारियों और उद्यमियों की परेशानियां और बढ़ेगी। 15 जुलाई से आयकर कानून में होने वाले बदलाव से टीडीएस (टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स) संबंधी नियमों के कारण व्यापारियों, व्यवसायियों और उद्यमियों के व्यवहारिक कठिनाई बढ़ेगी। इससे टीसीएस कटौती भी प्रभावित होगी। यूं भी टीसीएस के अमल में भी अनेक व्यवहारिक कठिनाई आती है। घूम फिर कर अंतत: बोझ ग्राहकों याने जनता पर ही पड़ता है। कोई भी व्यापारी या उद्योगपति अपनी पाकेट से टैक्स नहीं देता। वह इसके लिए भी ग्राहकों का शिकार करता है।

महंगाई के जन्म का भी कारण भ्रष्टाचार है
ग्राहक याने उपभोक्ता याने जनता भीषण महंगाई से पहले ही त्रासदी का सामना कर रही है। कहते हैं, अफसरशाही और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय हैं। कई इन दोनों परातत्वों को एक दूसरे का सहयोगी भी मानते हैं। सहयोगिता की वैल्यू का आधार उपयोगिता की प्राइस पर है। आप किसे कितना सहयोग करते हैं; इस पर से सामने वाला व्यक्ति तय करता है कि वह आप के किस कलर का और किस साइज का उपयोग कर सकता है। जिस प्रकार नेतागिरी और अफसरशाही के आशीर्वाद के बिना भ्रष्टाचार का पनपना असंभव है। उसी प्रकार कई सरकारों के सहयोग के बगैर महंगाई का जन्म होना भी असंभव है। कुंवारी कन्या के सामान बढ़ रही महंगाई पर मीडिया चाहे जितना भी लिखे, सरकार व नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता। यूं तो अनेक विविध स्वभाव की वेरायिटी वाले अफसरान महंगाई को भगाने जरूरी, गैरजरूरी तमाम कदम उठाते रहते हैं। किन्तु, महंगाई किस दिशा में हैं? अभी उस दिशा की शोध करना बाकी है। जैसे ही ये दिशा मिल जाएगी तभी महंगाई का छोर भी कन्फर्म हो जाएगा और कार्यवाही शुरू की जा सकेगी। वैसे महंगाई दूर करना आसान नहीं है। असंभव तो नहीं है, किन्तु संभवतया का अमलीजामा पहिनाना भी बहुत कठिन है। अंत में अभी तक होता यह आया है कि सत्तासीन नेता लोग अपनी असमर्थता दर्शाकर अफसोस के साथ यह कहते हैं कि भाईयों और बहनों, अनेक जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों ने ‘स्वजन हिताय-स्वजन सुखाय’ के लिए महंगाई को आजीवन रक्षण, आरक्षण देने का अपना स्वधर्म निभाया है।
ये तत्व अब ‘आऊट आफ आर्डर’ हैं। हमारे बनाएं सख्त कानून के बंधन में भी नहीं रहते। इसलिए, महंगाई फिलहाल तो हमसे दूर नहीं हो सकती। जब चुनाव करीब आयेंगे तब हम महंगाई दूर करने में समर्थ होंगे। उस समय हम पूरी तरह से जनता जनार्दन के साथ रहते हैं। हर समस्या का चिन्तन-चिन्ता करते हैं। किन्तु, किस समय यह काम करना है? इसका समय भी हम तय करते हैं।

कोरोनामुक्त हुआ शहर, तीसरी लहर की सुगबुगाहट
कोरोना की जंग शहर जीत चुका है। कोविड से मौत की दर शून्य हो गई है। जनजीवन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। बाजार भी गुलजार हो रहा है। साथ ही, कोरोना वायरस संक्रमण की तीसरी लहर की सुगबुगाहट तेज है। हर नया वैरिएंट पहले के मुकाबले ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है। कोरोना का कहर सिर्फ और सिर्फ वैक्सीनेशन से ही कम हो सकता है। शहर में यूं तो टीकाकरण अभियान तेज गति से चल रहा है, यह अच्छी बात है। वैक्सीन को लेकर यह बात सामने आई है कि यहां टीकाकरण बढ़ा है, वहां कोरोना वायरस ज्यादा जानलेवा साबित नहीं हुआ है। वैसे वैक्सीनेशन के संतोषजनक नतीजे दिखने अभी बाकी हैं। टीका आपूर्ति में कमी, सुरक्षा की चिन्ता, लोगों की लापरवाही, सरकारी स्वीकृति मिलने की बोझिल प्रक्रिया इस की मुख्य वजह हैं। हालांकि वैक्सीन सेहमारी कितनी सुरक्षा हो सकेगी? यह कहना अभी थोड़ा मुश्किल है परन्तु फिलहाल वैक्सीनेशन ही एक मात्र रास्ता है। वक्त आ गया है अब कोरोना को अपने ऊपर हावी ना होने दें। सोशल डिस्टेंस, मास्क का उपयोग, बार-बार हाथ धोते रहना ही समझदारी है। तीसरी लहर को भी हराना है। हमारे अपनों को कोरोना ने छीना है। हर हाल में हमें अब स्वयं व अपनों को सुरक्षित रखते हुवे फिर कोरोना पर जीत दर्ज कराने की है। प्रशासन को भी मुस्तैद रहना होगा। कोविड-19 के नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्यवाही का सिलसिला चलते ही रहना चाहिए।
वैसे कोरोना से कामनमैन कांपता है, नेता लोग ‘वाइब्रेन्ट’ हैं। सत्ताधारी पार्टी हो या सत्ताहारी पार्टी। नेता सदैव भाषणबद्ध होते हैं। ‘परोपदेशे पांडित्यम’ का ये पूरी निष्ठा और प्रतिबद्धता से पालन करते हैं। उन्हें इसके लिए भीड़ चाहिए और नेताप्रेमी यहीं पर मार खा जाते हैं।

आनलाईन शिक्षा से बच्चों पर बुरा असर
बच्चें मोबाईल, कम्प्यूटर, लेपटाप के सामने बैठकर बोर हो गए हैं। कोरोनाकाल में छात्र-छात्राएं भी बेहाल हो गए हैं। वे इसकी शिकायतें भी कर रहे हैं। किन्तु, पढऩा जरूरी है, इसलिए मां-बाप भी चाहे जो परिस्थितियां हों, वे अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। महामारी के कारण शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है। बच्चों के लिए आनलाइन शिक्षा ही एक मात्र उपाय है। आफ लाईन याने स्कूली शिक्षा को बच्चे तरस रहे हैं। जिले के अंतिम छोर तक तो अभी इन्टरनेट की सेवा लचर है। वहां दूर अंचलों में, सरकारी स्कूलों में आनलाईन शिक्षा केवल कागजों में हैं।

पिछले लम्बे समय से लॉकडाउन और उसके बाद से ईएनटी चिकित्सकों याने नाक, कान व गला विशेषज्ञों की भी चांदी हो गई है। उनके पास मरीज के रूप में बच्चों की संख्या बढ़ रही है। वे बच्चे जो ईयर फोन लगाकर घण्टों स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। ऐसे बच्चों में कान की तकलीफ बढ़ रही हैं। उनमें सुनने की क्षमता घट रही है। आंखों की समस्याओं में भी वृद्धि हो रही है। आंखों से पानी निकलता है। चश्में के नम्बर बढ़ गए हैं। इन्द्रियों को हो रहे नुकसान से अन्य शारीरिक और मानसिक बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में यही एक मुद्दा नहीं है। कोरोना संक्रमण से छात्रों की हिफाजत के मद्देनजर सीबीएसई सहित 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं रद्द कर दी। बिना परीक्षाएं पास किए बच्चों को पास कर दिया है। किन्तु, यह उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा रहा। बिना परीक्षा पास किए बच्चे कंपीटिशन कैसे क्लीयर करेंगे ?

उर्दू शायर फरहत शहजाद की गजल का लुफ्त उठाएं-
तन्हा तन्हा मत सोचा कर,
मर जाएगा, मत सोचा कर,
प्यार घड़ी भर का ही बहुत है,
झूठा-सच्चा मत सोचा कर
जिसकी फितरत ही डसना हो
वो तो डसेगा, मत सोचा कर
ख्वाब, हकीकत या अफसाना
क्या है दुनिया, मत सोचा कर
दुनिया के गम साथ हैं तेरे
खुद को तन्हा मत सोचा कर
मंूद ले आंखे और चला चल
मंजिल, रास्ता, मत सोचा कर
जीना दुभर हो जाएगा।
जानां, इतना मत सोचा कर।
– दीपक बुद्धदेव

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