गायत्री शक्तिपीठ में श्रीमद् देवी भागवत कथा
राजनांदगांव:- माहेश्वरी समाज द्वारा गायत्री शक्तिपीठ में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा के चौथे दिन व्यास पीठ से शास्त्री श्री ईश्वर चंद जी ने कहा कि कर्म गतिशील होता है। कर्म की एक गति होती है और कर्म किसी को भी नहीं छोड़ता। शरीर धारण करते ही आप गुणों से बंध जाते हैं। संसार में सब कुछ जगदंबा ने बनाया है। देव भी गुणों से बंधे हैं। पहले प्रारब्ध आता है और पीछे शरीर आता है। शरीर को धारण करते ही आप सुख दुख से बंध जाते हैं। यह सुख दुख आपके कर्मों के आधार पर होता है। शास्त्री श्री ईश्वर चंद जी व्यास ने कहा कि कबीर दास जी एक अवतार हैं। वह पहले अवतार हैं। दूसरे अवतार स्वामी रामदास जी और तीसरे अवतार रामकृष्ण परमहंस देव तथा चौथे अवतार श्री राम शर्मा आचार्य हैं। उन्होंने कहा कि हम कर्म करने में स्वतंत्र हैं किंतु कर्म के साथ आज्ञा भी जरूर होती है।
वेदों में भी हमें आज्ञा के अनुसार कर्म करने को कहा गया है। वेदों ने हमें आज्ञा दी है कि माता-पिता देव के समान हैं किंतु हम माता-पिता को देव का स्थान नहीं देते। उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं। वेदों ने हमें कहा है कि धर्म के अनुसार कार्य करो किंतु हम धर्म के अनुसार कार्य नहीं करते। उन्होंने कहा कि जिन्होंने मनमाना कर्म किया है वह दुखी होता है।
शास्त्री जी ने कहा कि कोई किसी को दुखी नहीं करता और कोई किसी को सुखी नहीं करता। मनुष्य अपने कर्म से दुखी और सुखी होता है, लेनदेन के आधार पर आप संसार में आए हैं जिसका लिया है उसे चुकाना ही होता है। प्रारब्ध को हम भोगते हैं। मनुष्य कामी, क्रोधी, राग-द्वेष वाला होता है। मनुष्य को धर्म करने के लिए कहना पड़ता है किंतु अधर्म करने के लिए कुछ भी नहीं कहना पड़ता। सबके मन में कहीं ना कहीं अहंकार होता है, जिसकी वजह से राग-द्वेष बढ़ता है। राग-द्वेष हुआ तो स्वार्थ बढ़ता है। शास्त्री जी ने कहा कि राग वह होता है जिसे हम जानते हैं कि उसका त्याग करना चाहिए किंतु हम उसका त्याग नहीं कर पाते और द्वेष वह है जिसे हमें स्वीकार नहीं करना चाहिए जो स्वीकार करने योग्य नहीं है, उसे हम स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा कि हम अभिमान के कारण उसे स्वीकार नहीं कर पाते। राग-द्वेष का जो त्याग कर देता है, वह सन्यासी हो जाता है और वह सुखी हो जाता है।