० व्यापारियों पर बढ़ता अनुपालन का बोझ,
० चेंबर से समस्या को पहल करने की अपेक्षा
राजनांदगांव (दावा)। आज के समय में जब सरकार ने वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) को ‘एक राष्ट्र, एक कर’ के सिद्धांत पर लागू किया था, तब यह कहा गया था कि यह व्यवस्था कराधान में पारदर्शिता, सरलता और सुगमता लाएगी। परन्तु आज, वास्तविकता इसके विपरीत दिखाई दे रही है। छोटे और मध्यम उद्योगों (स्रूश्वह्य) को हर महीने बदलते नियमों, जटिल रिटर्न फाइलिंग, ई-वेबिल और ई-इनवॉयस जनरेशन जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ज्ञात हो कि जुलाई २०१७ से अभी तक सैकड़ों बार जीएसटी अधिनियम में सुधार हुआ है। किन्तु छोटे-मध्यम व्यवसासियों को राहत नहीं है। छोटे-मध्यम व्यवसासी व्यापार छोडक़र नोटिसों में उलझे रहते है। चेंबर आफ कामर्स एवं कैद को इस ओर ध्यान देना चाहिये। छोटी-छोटी खामियों पर विभाग नोटिस थमा देता है। जबकि केन्द्र सरकार को व्यापार को बढ़ावा देने छोटे-मध्यम व्यवसासियों को राहत देना चाहिये।
रिटर्न फाइलिंग और अनुपालन का जटिल जाल
जीएसटी लागू होने के बाद व्यवसायियों को कई प्रकार के रिटर्न फाइल करने होते हैं -त्रस्ञ्जक्र-१, त्रस्ञ्जक्र-३क्च, त्रस्ञ्जक्र-९ आदि। इसमें समय पर अपलोडिंग, रीकॉन्सिलिएशन और सही जानकारी देना अत्यंत आवश्यक है। छोटे व्यवसायों के पास प्रशिक्षित अकाउंटेंट या टेक्निकल टीम का अभाव होता है, जिससे त्रुटियाँ होना आम बात है और पेनाल्टी तथा नोटिस मिलने की संभावना बनी रहती है। ई-वे-बिल और ई-इनवॉयस में दिक्कतें किसी भी माल की आवाजाही के लिए ई-वे-बिल बनाना अनिवार्य है। परंतु तकनीकी खामियों या पोर्टल का सर्वर डाउन रहने से बिल बनाना कठिन हो जाता है। यदि सही समय पर ई-वे-बिल न बने तो विभाग द्वारा मालवाहक वाहनों की चेकिंग व सीजिंग की कार्रवाई कर दी जाती है, जिससे छोटे व्यापारियों को आर्थिक नुकसान और माल की डिलेवरी में विलंब होता है। ई-इनवॉयस जनरेशन भी छोटी इकाइयों के लिए एक अतिरिक्त झंझट बन गया है, जिसमें बार-बार तकनीकी समस्याएँ आती रहती हैं। इनपुट टैक्स क्रेडिट (ढ्ढञ्जष्ट) की व्यवस्था जीएसटी की सबसे बड़ी विशेषता कही गई थी। कहा गया था कि टैक्स का बोझ कम होगा क्योंकि खरीददार उस पर क्रेडिट ले सकेगा। परन्तु हकीकत यह है कि यदि विक्रेता ने त्रस्ञ्जक्र-क्च में बिक्री दिखाकर त्रस्ञ्जक्र-३क्च में टैक्स जमा नहीं किया या सही से रिटर्न नहीं फाइल किया, तो खरीददार को आईटीसी का लाभ नहीं मिलेगा। त्रस्ञ्जक्र-२्र/२क्च में डेटा न दिखने पर आईटीसी काट लिया जाता है। ऐसे में ईमानदार खरीददार भी विक्रेता की गलती की सज़ा भुगतता है। नए नियम और अधिसूचनाएँ व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। लगातार नए-नए नोटिफिकेशन, नियम और शुल्क व्यापारियों के लिए सिरदर्द बन चुके हैं। कभी विलम्ब शुल्क तो कभी ब्याज, कभी ब्लाक क्रेडिट ये सब छोटे व्यापारियों के लिए बोझ ही बढ़ाते हैं। जटिलताएँ इतनी हैं कि व्यापारियों को अनुपालन के लिए अलग से कंसल्टेंट्स और तकनीकी टीम रखनी पड़ रही है, मंदी के दौर में इसका खर्च उठाना छोटे कारोबार के लिए कठिन होता जा रहा है।
निष्कर्ष : आसान प्रणाली की आवश्यकता
छोटे और मध्यम उद्योग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ ़हैं। यदि उन पर अनुपालन का बोझ ऐसे ही बढ़ता रहा तो कई व्यापार बंद होने की कगार पर पहुँच सकते हैं। सरकार को चाहिए कि जीएसटी प्रणाली को सरल बनाया जाए, ईमानदार करदाताओं को परेशान न किया जाए और आईटीसी के प्रवाह को सुगम बनाया जाए ताकि ‘एक राष्ट्र, एक कर’ का सपना वास्तव में सफल हो सके।



