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नेता-अफसर पानीदार-जनता पानी पानी, कीमती नलों से आ रहा दूषित पानी, क्या किसी बड़ी त्रासदी को अंजाम देगा?

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प्रशासन और राजनैतिक नेतृत्व के सुशासन पर सवालिया निशान

राजनांदगांव (दावा)। स्थानीय वार्ड नं.42 और 43 सहित कुछ मोहल्लों में कई दिनों से गंदा पानी पीने से कईयों की तबीयत खराब हुई। नलों से आ रहा पानी गंदा और बदबूदार होने से लोगों के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव डाल रहा है। उक्त वार्डों के अनेक वासियों ने अपनी इस पीड़ा को बताया और कहा कि निगम प्रशासन इसे अनसुना कर रहा है।

नगर निगम का प्रथम मुख्य कार्य पीने योग्य शुद्ध जल का प्रबंध तथा जल स्त्रोतों का निर्माण व योग्य व्यवस्था करना है। केन्द्र व राज्य का आवश्यक और अभिन्न अंग नगर निगम पर नियमों और अधिनियमों का पर्याप्त प्रभाव रहता है। किन्तु, नियंत्रण के लिए लागू किए गए अधिनियमों के अंतर्गत एकरूपता का अभाव दिख रहा है। राज्य स्तर, क्षेत्रीय स्तर और स्थानीय स्तर पर एकमतेन निरीक्षण बाबत जरूरी निर्णय व तद्अनुरूप कार्यवाही के अभाव में कि शहर की जनता ‘‘शुद्ध पेयजल’’ से वंचित है। इसमें केवल स्थानीय शासन को ही दोष देना उचित नहीं है। इसके ही बराबर का दायित्व राज्य सरकार का भी है। इन दोनों ही संस्थाओं में प्रतीत होता है कि ‘खींचतान’ के चलते वर्तमान परिस्थितियां जनहित के कार्यों में रूकावट डाल रही हैं। यहां अयोग्यता, भ्रष्टाचार, पक्षपात, कुनबापरस्ती हाबी है, यह सर्वविदित है।

शहर के नवागांव, ममतानगर, तुलसीपुर जैसे इलाकों में भी गंदेपानी की सप्लाई की जन शिकायतें सुर्खियों में रही हैं। इसे प्रशासनिक अपराध ही कहें कि जिस एस.एम.सी. कम्पनी को मोहारा स्थित 17 एमएलडी क्षमता वाले नए वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से पानी की आपूर्ति की जा रही है, वहां के संबंधित टंकियों से पाइपों व नलों में साफ पानी ही नहीं मिल रहा है। कहा जा रहा है कि उक्त जिम्मेदार कम्पनी बहुत पहले ही काम छोडक़र भाग गई है। इसके बावजुद उसे दोबारा जिम्मेदारी सौपें जाने से निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। लैब के संचालन में भी लापरवाही बरती जा रहीं है। कलेक्टर व निगम प्रशासक द्वारा स्वच्छ पानी प्रदाय करने के निर्देंश दिए गए थे। किन्तु, उनके निर्देंश भी बेअसर साबित हुए हैं।

जांच में नलों से दूषित पानी की पुष्टि के बावजुद जिम्मेदार कम्पनी पर ठोस कार्यवाही ही नहीं हुई। उल्लेखनीय कि २१० करोड़ रूपए की लागत से अमृत मिशन योजना के तहत नया प्लांट, छह उच्चस्तरीय टंकिया और नई पाइपलाईन बिछाने के बावजुद शहरवासियों को साफ पानी पीने को नहीं मिल रहा है। तब इसे क्या कहेंं? कौन जिम्मेदार है? हमारे स्थानीय जनप्रतिनिधिगण, जो थोक में हैं या फिर कार्यपालिका संबंधित अधिकारीगण? पूर्व सी.एम.व क्षेत्रीय विधायक डॉ. रमन सिंह आज भी ‘पालिटिकल व एडमिनिस्ट्रेटिव’ पावरफूल हैं। इसके बावजुद, उनके ही क्षेत्र के निवासियों को शुद्ध पेयजल नहीं मिल रहा है। क्या यह हमारा दुर्भाग्य है?

पूर्व में भी जल आवर्धन योजनांतर्गत पाइप लाईन बिछाने में करोड़ों रूपए खर्च हुए थे। इसी दौरान, नल जल/स्पार्ट सोर्स योजना को भी पूर्ण होना बताया गया था। लेकिन, इसका अपेक्षित लाभ जनता को मिल ही नहीं पाया। राजनांदगांव के ही ग्राम पार्रीकला, मुढ़ीपार एवं बघेरा के निवासियों में जल आपूर्ति को लेकर असंतोष है। पेयजल हेतु भू-जल, जल गुणवत्ताहीन है। ईमानदारी दिखाते हुए यदि नलों के पानी की जांच होती है तो नि:संदेह सेम्पल मानक अनुसार सही नहीं मिलेंगे। जिला स्तरीय पानी की गुणवत्ता जांच के प्रयोगशाला भी है, जो जिला एवं उपखण्ड स्तरो पर है, किन्तु इनकी कार्यप्रणाली पर प्रश्रचिन्ह है। शायद ये अपने दायित्वों से विमुख हैं।

हर साल लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के द्वारा हैण्डपम्पों की खुदाई, नल जल योजना, जल आवर्धन योजना एवं स्पाट सोर्स के कार्यों हेतु करोड़ों रूपए आबंटित किए जाते हैं। सभी योजनाएं भष्टाचार की सुलभ सुविधाओं के चलते उसका ग्रास बन जाती हैं। केन्द्र सरकार प्रत्येक राज्य सरकारों को राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के अतंर्गत मोटी राशि आबंटित करती है। लेकिन स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग भारी पर्सन्टेज की कमीशनरखोरी से अपेक्षित सफलता से बहुत दूर रहता है। जहां यह भी कहना उचित लगता है कि भ्रष्टाचार के काले हाथ कानून के सफेद हाथ से लम्बे हो गए हैं। बावजुद इसके दोनों हाथों में किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा नहीं है। कानून अपना काम करता है, भ्रष्टाचार अपना। कई बार दोनों एक ही काम करते दिखाई दे जाते हैं।

जिसका ही परिणाम है कि, अमृत मिशन योजना के बावजुद शहर के चंद वार्डों में पानी की आपूर्ति प्रभावित होती रहती है। कई जगहों पर पुरानी पाइप लाईनों का इस्तेमाल हो रहा है। कुछ जगहों पर पाइप लाईन ही नहीं बिछाई गई है। इस समस्या के परिप्रेक्ष्य में निगम प्रशासन को पेयजल व्यवस्था को मजबूत करने के लिए नए कार्यों के लिए प्रशासनिक स्वीकृति मिली है। लगभग डेढ़ करोड़ की लागत से पाईप लाइन विस्तार एवं वितरण से जुड़े कार्यों को किया जाएगा। प्रश्र यहां अब भी यथावत है कि क्या जनता को शुद्ध पेयजल नसीब होगा?

जिले में ‘जल जीवन मिशन’ के स्वीकृति कार्योे, उसके सम्पादन को लेकर थोक में जन शिकायतें हुई हैं। कई कार्य तो अभी भी अपूर्ण है, कई तो शुरू ही नहीं हुए। निर्मित पानी की टंकियां भी गुणवत्ताहीन है। प्रशासनिक क्षेत्र में धीमी गति से कार्य करने, कार्यों में अनियमितता करने तथा अन्य प्रकार की शिकायतें इसकी पुष्टि करती हैं कि विभिन्न समाजों से आए नेता व अधिकारी भ्रष्टाचार की मुख्यधारा में गोते लगा रहे हैं और व्यवस्था के प्रति असंतोष रखने वाले लोग लाचार और विवश हैं।

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