डोंगरगढ़ के पूर्व विधायक ने खाद के लिए लागू ‘टोकन सिस्टम’ को बताया किसान विरोधी, सरकार पर साधा निशाना
डोंगरगढ़: छत्तीसगढ़ में खाद की किल्लत और पंजीयन की नई व्यवस्था को लेकर राजनीति गरमा गई है। डोंगरगढ़ के पूर्व विधायक भुनेश्वर बघेल ने प्रदेश की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि जो किसान पूरे देश का पेट भरता है, आज उसे ही अपनी फसल के लिए खाद जुटाने दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने जानबूझकर ऐसी पेचीदा व्यवस्था लागू की है जिससे किसान खेती छोड़ दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।
खेत छोड़कर पोर्टल और टोकन में उलझा किसान
पूर्व विधायक बघेल ने वर्तमान स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा, “छत्तीसगढ़ का किसान आज खेत में पसीना बहाने के बजाय सरकारी पोर्टल, पंजीयन और टोकन की पेचीदगियों में उलझा दिया गया है। जिस किसान के हाथ में खाद की बोरी होनी चाहिए, उसे आवेदन और टोकन की पर्चियां थमा दी गई हैं।” उन्होंने कहा कि भाजपा की ‘डबल इंजन’ सरकार किसानों को सहायता देने के बजाय उनके सामने कृत्रिम संकट खड़ा कर रही है।
सर्वर डाउन और कतारों से बेहाल अन्नदाता
बघेल ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए कहा कि गांव-गांव में किसान सुबह से लंबी कतारों में खड़े हैं। कभी सर्वर डाउन होने से काम रुक जाता है, तो कभी टोकन खत्म होने की बात कहकर किसानों को लौटा दिया जाता है। इस व्यवस्था का सबसे बुरा असर बुजुर्ग और छोटे किसानों पर पड़ रहा है, जो बिचौलियों के चंगुल में फंसने को मजबूर हो रहे हैं।
क्या 21 क्विंटल धान खरीदी से बचने की है साजिश?
पूर्व विधायक ने सरकार की मंशा पर बड़ा सवाल उठाते हुए कहा कि खाद की उपलब्धता को सीमित करना एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। उन्होंने आशंका जताई कि सरकार शायद चाहती है कि खाद न मिलने से उत्पादन कम हो, ताकि भविष्य में 21 क्विंटल प्रति एकड़ धान खरीदी के अपने वादे से बचा जा सके। उन्होंने सीधे शब्दों में पूछा— “यदि सरकार की नीयत साफ है, तो पर्याप्त खाद देने में डर कैसा?”
“छत्तीसगढ़ नहीं सहेगा किसान का अपमान”
बघेल ने सख्त लहजे में कहा कि किसान कोई प्रयोगशाला का विषय नहीं, बल्कि देश की अन्नशक्ति है। पंजीयन के नाम पर उन्हें प्रताड़ित करना बंद होना चाहिए। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की है कि:
तत्काल प्रभाव से इस जटिल और “किसान विरोधी” टोकन व्यवस्था को निरस्त किया जाए।
किसानों को उनकी आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त खाद की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
अंत में उन्होंने चेतावनी भरे स्वर में कहा— “किसान का अपमान छत्तीसगढ़ नहीं सहेगा। अन्नदाता को अधिकार चाहिए, तंग करने वाली व्यवस्था नहीं।”



