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रेल्वे ओवरब्रिज में ब्लैक सॉइल बेल्ट में तकनीकी मानकों की अनदेखी पड़ी भारी, धंसाव और दरारों से गुणवत्ता पर उठे सवाल…

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पहली ही बारिश ने खोली पोल: करोड़ों की लागत से बने तीन नए रेलवे ओवरब्रिज के एप्रोच मार्ग धंसे, निर्माण कार्य पर उठे गंभीर सवाल

राजनांदगांव (दावा)। जिले में नवनिर्मित बरगा, आलीवारा और मुसरा रेलवे ओवरब्रिज के एप्रोच मार्ग पहली ही तेज बारिश के बाद बुरी तरह प्रभावित हो गए हैं। इस घटना ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और अपनाई गई तकनीकी प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रारंभिक तकनीकी विश्लेषण के अनुसार ये तीनों परियोजनाएं ब्लैक सॉइल (काली मिट्टी) बेल्ट के अंतर्गत आती हैं। जहां सडक़ निर्माण के लिए विशेष वैज्ञानिक सावधानियां बरतना अनिवार्य होता है, लेकिन यहां ऐसा नहीं किया गया।

ब्लैक सॉइल क्षेत्र में क्यों जरूरी थी अतिरिक्त सावधानी?
सिविल इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का कहना है कि ब्लैक सॉइल (काली मिट्टी) की सबसे बड़ी विशेषता इसका मौसम के अनुसार सिकुडऩा और फैलना है। इस प्रकार की मिट्टी पर जब भी सडक़ या एप्रोच मार्ग का निर्माण किया जाता है तो सबग्रेड (आधार परत) को पर्याप्त समय तक प्राकृतिक रूप से बैठने (सेटलमेंट) देना बेहद आवश्यक होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार
यदि मुरुम से तैयार किए गए अर्थवर्क (मिट्टी के काम) को सेट होने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता और जल्दबाजी में ऊपरी परतें बिछा दी जाती हैं, तो पहली ही तेज बारिश में मिट्टी धंस जाती है। इस बेल्ट में केवल मुरुम डालना काफी नहीं होता। प्रत्येक परत पर निर्धारित मात्रा में वॉटरिंग (पानी डालना), उच्च गुणवत्ता का कंपैक्शन और फील्ड डेंसिटी टेस्ट जैसी प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन करना जरूरी है। सबग्रेड को कम से कम एक अच्छे मानसून या पर्याप्त प्राकृतिक सेटलमेंट के बाद ही अंतिम रूप दिया जाना चाहिए था।

पुल संरचना सुरक्षित, पर एप्रोच रोड पर बड़ा नुकसान
राहत की बात यह है कि तकनीकी विशेषज्ञों के प्रारंभिक आकलन के अनुसार तीनों ओवरब्रिज की मुख्य पुल संरचना फिलहाल पूरी तरह सुरक्षित है। नुकसान मुख्य रूप से पुल को जोडने वाली एप्रोच रोड के नीचे तैयार किए गए सबग्रेड और अर्थवर्क में हुआ है। बरगा में सडक़ पर बड़ी-बड़ी दरारें दिखाई दी हैं। जबकि आलीवारा और मुसरा में भी एप्रोच मार्ग धंसने से प्रभावित हुए हैं।

तकनीकी जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
सडक़ों के धंसने की असली वजह क्या है। इसका खुलासा अब विस्तृत भू-तकनीकी एवं संरचनात्मक जांच के बाद ही हो सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जांच के दौरान सबग्रेड की गुणवत्ता, कंपैक्शन रिपोर्ट, मिट्टी परीक्षण, ड्रेनेज व्यवस्था और निर्माण के दौरान अपनाई गई तकनीकी प्रक्रियाओं की बारीकी से स्कू्रटनी की जानी चाहिए। अब सभी की निगाहें आने वाली तकनीकी जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। जिससे यह स्पष्ट होगा कि यह क्षति केवल प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण हुई है या फिर निर्माण एजेंसी द्वारा तकनीकी मानकों में की गई किसी बड़ी चूक का परिणाम है।

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