मुख्य बातें (Key Highlights)
खैरागढ़ में शोक की लहर: प्रेम कुमार सरस्वती शिशु मंदिर की आजीवन प्रधानाचार्य और राजपरिवार की वरिष्ठ सदस्य सुश्री राजलक्ष्मी सिंह (69 वर्ष) का रविवार देर रात निधन।
संपूर्ण जीवन शिक्षा को समर्पित: आजीवन अविवाहित रहकर बच्चों को दिए संस्कार; जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा का उठाया था बीड़ा।
अंतिम विदाई: सोमवार सुबह 10 बजे राजनिवास से निकली अंतिम यात्रा, सरस्वती शिशु मंदिर परिसर में रो पड़े शिक्षक और छात्र; लालपुर मुक्तिधाम में भतीजे भागवत शरण सिंह (डंपी) ने दी मुखाग्नि।
विस्तृत समाचार
खैरागढ़: छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले से एक अत्यंत दुःखद और हृदयविदारक खबर सामने आई है। खैरागढ़ राजपरिवार की वरिष्ठ सदस्य, प्रख्यात शिक्षाविद् एवं प्रेम कुमार सरस्वती शिशु मंदिर की आजीवन प्रधानाचार्य सुश्री राजलक्ष्मी सिंह का रविवार की देर रात 12:36 बजे, 69 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे पिछले कुछ महीनों से अस्वस्थ चल रही थीं। उनके निधन से न केवल राजपरिवार, बल्कि क्षेत्र के हजारों विद्यार्थियों, अभिभावकों और पूरे शिक्षा जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
शिक्षा को बनाया अपना जीवन-धर्म
सुश्री राजलक्ष्मी सिंह ने आजीवन अविवाहित रहकर अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा और समाजसेवा को समर्पित कर दिया। उन्होंने केवल एक शिक्षिका या प्रधानाचार्य के रूप में कार्य नहीं किया, बल्कि शिक्षा को अपना जीवन-धर्म बनाया। गंभीर रूप से अस्वस्थ होने तक वे निरंतर विद्यालय में अपनी सेवाएं देती रहीं। छात्र-छात्राओं के बीच वे बेहद आत्मीयता से ‘राज दीदी’ के नाम से प्रसिद्ध थीं। उनके लिए हर बच्चा केवल एक विद्यार्थी नहीं, बल्कि उनके अपने परिवार का हिस्सा था।
त्याग और सेवा की मिसाल
निःशुल्क शिक्षा: राजलक्ष्मी सिंह ने कई जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की पढ़ाई का पूरा जिम्मा उठाया और व्यक्तिगत रूप से सहयोग किया ताकि तंगी किसी की शिक्षा में बाधा न बने।
विद्यालय के लिए दान: सरस्वती शिशु मंदिर के अतिरिक्त कक्ष के निर्माण के लिए उन्होंने अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा दान कर दिया था।
संस्कारों की विरासत: वे खैरागढ़ के दिवंगत राजनीतिज्ञ एवं समाजसेवी स्व. लाल शरण सिंह की सुपुत्री तथा सांसद प्रतिनिधि एवं समाजसेवी भागवत शरण सिंह (डंपी) की बुआ थीं। उन्होंने अपने पिता से मिले सेवा और राष्ट्रभक्ति के संस्कारों को आजीवन पूरी निष्ठा से निभाया।
नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई
सोमवार की सुबह 10 बजे राजपरिवार स्थित उनके निवास स्थान से उनकी अंतिम यात्रा निकाली गई। पार्थिव शरीर को सबसे पहले उनके कर्मस्थली प्रेम कुमार सरस्वती शिशु मंदिर ले जाया गया, जहां विद्यालय परिवार, शिक्षक-शिक्षिकाओं और छात्र-छात्राओं ने अपनी ‘राज दीदी’ को अंतिम विदाई दी। इस दौरान स्कूल परिसर में मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं और कई छात्र-छात्राएं व शिक्षक फफक-फफक कर रो पड़े।
इसके पश्चात उनके पार्थिव शरीर को राजपरिवार के लालपुर स्थित मुक्तिधाम ले जाया गया, जहां राजपरिवार के सदस्यों, जनप्रतिनिधियों, गणमान्य नागरिकों और शुभचिंतकों ने उन्हें भारी मन से अंतिम विदाई दी। उनके भतीजे भागवत शरण सिंह (डंपी) ने उन्हें मुखाग्नि दी।
भौतिक रूप से ‘राज दीदी’ भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा रोपे गए ज्ञान और संस्कारों के बीज हमेशा इस क्षेत्र के जन-मानस और उनके विद्यार्थियों के दिलों में जीवित रहेंगे।



