
यतेन्द्र जीत सिंह ‘छोटू’ (ब्यूरो चीफ, खैरागढ़)
खैरागढ़ दावा। धर्मनगरी डोंगरगढ़ और खैरागढ़ के जंगलों में एक बार फिर तेंदुए की हलचल ने आम जनता में दहशत और वन विभाग के लिए सुरक्षा की नई चुनौती खड़ी कर दी है। प्रज्ञागिरी पहाड़ी के समीप तेंदुए का करीब 1 मिनट 32 सेकंड का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद जहां क्षेत्र में कौतूहल और डर का माहौल है, वहीं इस घटना ने दोनों जिलों के जंगलों में जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण की लचर व्यवस्था को फिर उजागर कर दिया है।
सोशल मीडिया पर लोकेशन वायरल, शिकारियों के लिए खुला न्योता
तेंदुआ दिखते ही वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर लोकेशन सार्वजनिक करने का चलन वन्यजीवों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। लोकेशन वायरल होने से दोहरी समस्या खड़ी हो रही है:
तमाशबीनों की भीड़: लोग रोमांच के चक्कर में जंगल और पहाड़ियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है।
शिकारी गिरोह सक्रिय: सटीक लोकेशन मिलते ही वन्यजीव तस्कर और शिकारी गिरोह सक्रिय हो जाते हैं, जिससे तेंदुए की जान सीधे तौर पर जोखिम में पड़ जाती है।
शिकार और तस्करी का पुराना रिकॉर्ड
डोंगरगढ़-खैरागढ़ क्षेत्र में दशकों से तेंदुए का प्राकृतिक रहवास रहा है। पूर्व में भी इस इलाके से तेंदुए की खाल, नाखून के साथ तस्करों की गिरफ्तारी और संदिग्ध परिस्थितियों में शव मिलने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इसके बावजूद इन संवेदनशील वनों को अब तक किसी विशेष वन्यजीव संरक्षण परियोजना या सुरक्षित कॉरिडोर का दर्जा नहीं मिल सका है।
बांस कटाई तक सीमित योजनाएं, संरक्षण से दूरी
सरकारी स्तर पर डोंगरगढ़ के जंगलों में अब तक मुख्य रूप से बांस कटाई और बिगड़े वनों के सुधार जैसे पारंपरिक कार्य ही होते रहे हैं। तेंदुए और अन्य वन्यजीवों के लिए भोजन-पानी के स्थायी स्रोत, सेफ कॉरिडोर और वैज्ञानिक सुरक्षा तंत्र (जैसे सघन कैमरा ट्रैप व 24×7 एंटी-पोचिंग पेट्रोलिंग) धरातल पर नजर नहीं आते।
इसके अलावा जंगलों में अनियंत्रित ट्रैकिंग, नाइट स्टे और पर्यटन जैसी गतिविधियां बिना सुरक्षा मानकों के बढ़ने से वन्यजीवों का प्राकृतिक पर्यावास लगातार सिमट रहा है।
प्रशासन और वन विभाग के सामने खड़े बड़े सवाल:
क्या सोशल मीडिया पर संवेदनशील लोकेशन वायरल होने से रोकने और तत्काल सुरक्षा घेरा बनाने की कोई त्वरित कार्यप्रणाली है?
क्या इन पहाड़ियों और जंगलों में अवैध शिकार रोकने के लिए पर्याप्त नाइट विजन कैमरा ट्रैप और पेट्रोलिंग दल मौजूद हैं?
क्या डोंगरगढ़-खैरागढ़ के जंगलों के लिए कोई दीर्घकालीन ‘लेपर्ड कंजर्वेशन प्लान’ तैयार किया जाएगा?
पर्यटन और राजस्व बढ़ाने की होड़ में वन्यजीवों के प्राकृतिक घर की सुरक्षा को कब प्राथमिकता मिलेगी?
डोंगरगढ़ में हर बार वन्यजीव दिखने पर वन विभाग की सक्रियता केवल मुनादी और अस्थाई गश्त तक सीमित रह जाती है। सवाल सिर्फ आज दिखे तेंदुए का नहीं, बल्कि यह है कि क्या शासन-प्रशासन की फाइलों में इन समृद्ध जंगलों और उनके वन्यजीवों को बचाने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना आकार लेगी, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह धरोहर सुरक्षित रह सके।



