धर्म करने की अंतरंग इच्छा होनी चाहिए
राजनांदगांव ।श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य श्री वीरभद्र ( विराग ) मुनि जी ने आज यहां कहा कि हम देश-विदेश के बारे में तो सभी जानते हैं किंतु अपने बारे में क्या जानते हैं? हमें स्वयं को जानने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए जरूरी है धर्म करने की अंतरंग इच्छा का होना। मुनि श्री ने कहा कि जो दृष्टि ज्ञानियों के पास है वह हमारे पास नहीं है।
मुनि श्री वीरभद्र(विराग) जी ने जैन बगीचा स्थित उपाश्रय भवन में अपने नियमित प्रवचन के दौरान कहा कि हर व्यक्ति को कुछ ना कुछ धर्म तो करना ही चाहिए। कुछ नहीं तो प्रतिक्रमण ही कर ले। गलती करने पर तत्काल माफी मांग ले। जो पाप हुए हैं उसके लिए इस काया को दंड देना चाहिए।सामायिक, वंदन,प्रतिक्रमण, पापों की आलोचना, यह सभी अनिवार्य रूप से करना चाहिए। धर्म करने के लिए पदार्थो को पूर्व क्रम से जानना आवश्यक है।
मुनि श्री वीरभद्र जी ने आगे कहा कि हमारी अंतर भावना निर्मल होनी चाहिए और धर्म के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। जीवन में जो घटनाए घट रही है, उन घटनाओं के घटने के पीछे का कारण जानना चाहिए। हमने दुनिया देख ली किंतु हमसे मोबाइल नहीं छूटता। पता नहीं मोबाइल से और क्या जानने की इच्छा रहती है। संस्कार देने की पहली जिम्मेदारी परिवार के दादा- दादी और माता-पिता और परिजनों की है। इसके बाद दूसरी जिम्मेदारी धर्म गुरुओं की है। साइकिल/ स्कूटर चलाते समय हम कितनी बार गिरते हैं किंतु आखिर में हम उसे चलाना सीख ही जाते हैँ। इसी तरह धर्म की राह कितनी भी कठिन क्यों ना हो आखिरकार हम आत्म कल्याण मार्ग की और बढ़ ही जाते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि गुणवान व्यक्ति दूसरे के गुणों की अनुमोदना करता है, जबकि हम अपने ही गुणों को बखान करने में लगे रहते हैं। हमें दूसरों के गुणों की भी अनुमोदना करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा शरीर किस काम का जो भगवान की आज्ञा का पालन न कर सके। मुनिश्री ने आगे कहा कि हमें धर्म करते हुए आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़ना है और अपना जीवन सफल बनाना है।



