आदेश का परिपालन 20 साल बाद भी नहीं
डोंगरगाँव (दावा)। जिले के शासकीय कार्यालयों में सूचना के अधिकार अधिनियम की धज्जियाँ उड़ रही है और इसे देखने वाला कोई अधिकारी नहीं है। कहीं सूचना के अधिकार संबंधी बोर्ड नदारत है, तो कहीं रसीद बुक ही नदारत है। ऐसा ही मामला पीएमश्री स्वामी आत्मानंद शासकीय इंग्लिश मीडियम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस डोंगरगांव का आया है, जहाँ न तो सूचना के अधिकार को लेकर यहाँ पदस्थ कर्मचारी ही गंभीर हैं और न ही विभागीय अधिकारियों को इस विषय को लेकर कोई सुध है। केन्द्र सरकार के महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत चल रहे इस शाला में पदस्थ प्राचार्य सूचना के अधिकार में मांगी गई जानकारी को लेकर भी गंभीर नहीं हैं। उनका मानना है कि सूचना के अधिकार में मांगी गई जानकारी इतना महत्वपूर्ण नहीं है। शासन द्वारा उन्हें काफी दबाव है और पहली प्राथमिकता में शासन से मांगी गई जानकारी दी जायेगी।
बता दें कि कार्यालयों में जनसूचना अधिकारी व प्रथम अपीलीय अधिकारी का नाम, पदनाम एवं पते का उल्लेख नहीं होने से प्रकरणों के निराकरण में अनावश्यक विलंब होता है, जिसका खामियाजा अपीलार्थी या शिकायतकर्ता को भुगतना पड़ता है।
आदेश का परिपालन 20 साल बाद भी नहीं
सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत राज्य के शासकीय/अद्र्ध शासकीय एवं निगम/मंडल आदि कार्यालयों में शासन व्दारा सहायक जनसूचना अधिकारी/जनसूचना अधिकारी/अपीलीय अधिकारी नियुक्त किये गए हैं। इन अधिकारियों के नाम एवं धारित पद की पट्टिका सूचना पटल तथा संबंधित अधिकारी के कक्ष के सामने लगी होनी चाहिए। इस संबंध में बाकायदा राज्य शासन द्वारा संदर्भित परिपत्र 11 अक्टूबर 2005 एवं 14 नवम्बर 2005 जारी किए गए हैं और इस संबंध में छ.ग.शासन सामान्य प्रशासन विभाग व्दारा 13 अप्रैल 2006 पुन: आदेश जारी किया गया था किन्तु शासन के आदेश को दरकिनार करते हुए अधिकांश कार्यालय और जिले के अधिकारी आंख बंद कर बैठे हुए हैं।
60 दिवस में भी नहीं मिली जानकारी-
इधर आरटीआई कार्यकर्ता गोविन्द प्रसाद गुप्ता द्वारा पीएमश्री स्वामी आत्मानंद शासकीय इंग्लिश मीडियम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस डोंगरगांव में 23 जून 2025 को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत नियमत: एक जानकारी मांगी गई थी। जिसके 29 दिवस बाद 21 जुलाई को इसके लिए शाला के प्राचार्य द्वारा 700 रूपये का डिमांड लेटर दिया गया था, जिसे 13 अगस्त 2025 को आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा जमा करवा दिया गया। राशि जमा होने के बाद भी आज पर्यन्त सूचना के अधिकार में मांगी गई जानकारी नहीं दी गई है। बता दें कि सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मांगी गई जानकारी आवेदन लगने के 30 दिवस के भीतर प्रदाय करने का नियम है। जिसमें जिले में बैठे अधिकारियों के ढुलमुल रवैय्या के चलते लापरवाह कर्मचारियों पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती और आरटीआई कार्यकर्ताओं को बेवजह परेशान होना पड़ता है और मजबूरन प्रथम अपीलीय अधिकारी और राज्य सूचना आयोग तक जाकर अपना समय और पैसा दोनों खर्च करना पड़ता है। प्रथम अपीलीय अधिकारी की जानकारी लेने जब आरटीआई कार्यकर्ता संबंधित स्कूल पहुंचे तो उन्हें कहीं भी सूचना के अधिकार से संबंधित कोई भी बोर्ड नहीं दिखा।
जनसूचना अधिकारियों को ही नहीं है नियमों का ज्ञान
अधिकांश शासकीय कार्यालयों में जनसूचना अधिकारी बनकर बैठे कर्मचारियों और अधिकारियों को सूचना के अधिकार अधिनियम को लेकर जागरूकता ही नहीं है। उन्हें सामान्यत: 30 दिवस के भीतर दिए जाने वाले जानकारी के विषय में तो थोड़ा बहुत ज्ञान है और इसे ही पकडकर वे आवेदन के तीन दिनों को गिनते रहते हैं जबकि नियम में यह है कि फीस जमा होने के बाद या तो सूचना उपलब्ध कराया जाना चाहिए या धारा 8 एवं 9 में विनिर्दिष्ट कारणों में से किसी कारण से अनुरोध को अस्वीकार करेगा, परन्तु जहाँ मांगी गई जानकारी का संबंध किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से है, वहाँ अनुरोध प्राप्त होने के 48 घंटे के भीतर जानकारी उपलब्ध कराया जाना है। सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से इस गंभीर विषय को लेकर संबंधित अधिकारियों को बकायदा प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि आरटीआई कार्यकर्ताओं को सूचना लेने में आसानी हो सके।



