Home छत्तीसगढ़ बालोद में कानून का दम घुट रहा : पत्रकार को धमकी से...

बालोद में कानून का दम घुट रहा : पत्रकार को धमकी से प्रशासनिक अत्याचार का कुरूप चेहरा उजागर…

20
0

डौंडीलोहारा में अवैध कॉलोनी की खबर पर नायब तहसीलदार पर देख लेंगे की धमकी देने का आरोप, प्रशासन की साख पर गहरा सवाल

बालोद (दावा)। छत्तीसगढ़ का बालोद जिला इन दिनों एक ऐसी घटना के कारण सुर्खियों में है। जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था को शर्मसार कर दिया है। डौंडीलोहारा में अवैध समता कॉलोनी से जुड़ी खबर सामने आने के बाद दैनिक दावा के संवाददाता को कथित रूप से देख लेने की धमकी मिलने का मामला प्रशासनिक मशीनरी के निरंकुश होने का गंभीर संकेत देता है। दैनिक दावा संवाददाता की ओर से नायब तहसीलदार दीपक चंद्राकर के खिलाफ लगाए गए ये आरोप प्रशासन की साख को सीधी चुनौती देते हैं और पूरे तंत्र की तटस्थता पर गहरे सवाल खड़े करते हैं।

पत्रकारिता के अधिकारों पर सीधा हमला
आरोप है कि अवैध कॉलोनी की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद, संबंधित सरकारी अधिकारी द्वारा पत्रकार को फोन पर देख लेंगे कहा गया। यह शब्द सिर्फ एक धमकी नहीं है; यह लोकतंत्र की रीढ़—मीडिया—को तोडऩे की मानसिकता और पत्रकारिता के अधिकारों पर सीधा हमला है। यह दर्शाता है कि कुछ अधिकारी खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। लेख में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या प्रशासन का काम भ्रष्टाचार को ढकना है या उसे उजागर करना? पत्रकारिता के पहरेदारों को डराने का यह प्रयास बताता है कि अधिकारी कानून के अनुयायी होने के बजाय, अपने पद की शक्ति के मद में चूर होकर जनता और मीडिया को ही डराने वाले सामंती चरित्र में ढल गए हैं।

न्याय और सुरक्षा पर गंभीर चिंता
इस घटना को प्रशासन की आंतरिक सड़ांध का संकेत मानते हुए, यह सवाल किया गया है कि अगर दस्तावेज़ों और तथ्यों के साथ सवाल उठाने वाले पत्रकार को ही धमकी दी जा रही ह तो आम नागरिकों के लिए न्याय और सुरक्षा कितनी दूर की चीज होगी? यदि पत्रकार को संरक्षण की उम्मीद उसी तंत्र से करनी पड़े जिस पर आरोप लगाया गया है, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। डौंडीलोहारा का यह मामला सिर्फ एक फोन कॉल का नहीं, बल्कि उस सिस्टम के चरित्र का आईना है जो अपने अधिकार को सत्ता मानता है और सच बोलने वालों को दुश्मन समझता है।

कड़ी जांच की आवश्यकता
लेख में सिविल सेवा आचरण संहिता के उल्लंघन को लोकतंत्र की आत्मा पर चोट बताते हुए एक कड़ी, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की तत्काल आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है। निष्कर्ष में कहा गया है कि यह मामला सिर्फ एक पत्रकार या एक अधिकारी का नहीं, बल्कि बालोद प्रशासन की विश्वसनीयता, न्यायिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा का मामला है। प्रशासन को अब तय करना होगा कि यहां कानून चलेगा या सत्ता और शक्ति का आतंक।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here