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सुशासन की धज्जियाँ उड़ाता सचिवराज ओझागन पंचायत में लोकतंत्र बंधक, विकास योजनाएं बनी लूट का हथियार…

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बालोद । छत्तीसगढ़ में सुशासन और पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावों के बीच बालोद जिले के गुरूर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत ओझागन एक भयावह उदाहरण बनकर उभरी है, जहां लोकतंत्र नहीं बल्कि सचिवराज चल रहा है। यहां पदस्थ ग्राम पंचायत सचिव हेमलाल साहू पर आरोप है कि उन्होंने पंचायत को अपनी निजी जागीर में तब्दील कर दिया है और शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं को ग्रामीणों से छीनकर कागजों में कैद कर दिया है।

ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत सचिव की कार्यशैली तानाशाही से कम नहीं है। गांव के चहुंमुखी विकास के लिए संचालित राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान, मुख्यमंत्री समग्र ग्रामीण विकास योजना, जिला व जनपद पंचायत निधि, पंचायत सशक्तिकरण योजना, स्वच्छ भारत मिशन, वित्त आयोग, मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना जैसी दर्जनों योजनाएं या तो ‘‘बंद’’ बताई जाती हैं या फिर उनकी फाइलें रहस्यमय तरीके से ‘‘गायब’’ कर दी जाती हैं। यह कोई साधारण लापरवाही नहीं बल्कि योजनाबद्ध प्रशासनिक अपराध का संकेत है। सवाल यह है कि यदि फाइलें और बिल गुम हैं तो इसकी लिखित सूचना सरपंच, जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी और थाने में क्यों नहीं दी गई? क्या पंचायत कार्यालय अब जवाबदेही से परे कोई सुरक्षित ठिकाना बन चुका है? स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि ग्राम सभा की बैठकें केवल कागजों में सिमट गई हैं। न ग्रामीणों से जरूरतें पूछी जाती हैं, न ही योजनाओं का प्राथमिकता निर्धारण होता है।

ग्राम पंचायत विकास योजना जैसी बुनियादी व्यवस्था, जिसका उद्देश्य सहभागी नियोजन और पारदर्शी विकास है, उसे पूरी तरह कुचल दिया गया है। प्लान-प्लस और एक्शन-सॉफ्ट जैसे भारत सरकार के सॉफ्टवेयर केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं, जिनका जमीन पर कोई असर दिखाई नहीं देता। ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और वंचित वर्गों के लिए निर्धारित योजनाओं को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। सामाजिक सुरक्षा, रोजगार, आवास, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे से जुड़ी जरूरतें सचिव की फाइलों में दम तोड़ रही हैं, जबकि कथित तौर पर लाभ किसी और दिशा में बह रहा है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि पंचायत का सरपंच और पंच भी इस सचिवशाही के आगे असहाय नजर आते हैं। निर्णय लेने का अधिकार ग्राम सभा से छीनकर एक व्यक्ति विशेष के हाथों में सौंप दिया गया है। यह न केवल पंचायती राज व्यवस्था का अपमान है, बल्कि संविधान की भावना पर भी सीधा हमला है।अब सवाल केवल ओझागन पंचायत का नहीं, बल्कि पूरे पंचायत तंत्र की साख का है। इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को बदनाम करना नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन का ध्यान उस सड़ांध की ओर खींचना है, जो पंचायत स्तर पर लोकतंत्र को खोखला कर रही है।

आवश्यकता है तत्काल निष्पक्ष जांच, योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण, फाइलों और बिलों की फॉरेंसिक जांच तथा दोषी पाए जाने पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की। यदि आज सचिवशाही पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो कल गांव-गांव में सुशासन केवल भाषणों की शोभा बनकर रह जाएगा और ग्रामीणों का विश्वास हमेशा के लिए टूट जाएगा।

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