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कानून बेबस, किसान मजबूर : बालोद में खाद बिक्री के नाम पर प्रशासनिक विफलता की खुली तस्वीर…

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नियमों को ठेंगा दिखा रहे व्यापारी, खाद के साथ जबरन थमाए जा रहे अन्य उत्पाद, कृषि विभाग मौन

बालोद (दावा)। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में अन्नदाता आज केवल मौसम और खेतों की चुनौतियों से ही नहीं, बल्कि भ्रष्ट व्यवस्था से भी जंग लड़ रहा है। धान खरीदी की अव्यवस्थाओं के दंश से अभी किसान उबरा भी नहीं था कि खाद वितरण की धांधलियों ने उसकी कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि खेती के लिए अनिवार्य खाद अब सरकार के निर्धारित नियमों पर नहीं, बल्कि व्यापारियों की मनमर्जी और शर्तों पर मिल रही है।

शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि खाद की बिक्री स्वतंत्र रूप से होगी और कोई भी विक्रेता किसान को खाद के साथ अन्य गैर-जरूरी उत्पाद (जैसे टॉनिक या अन्य कीटनाशक) खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। इसके बावजूद बालोद के कई कृषि केंद्रों पर किसानों को यह विकल्प तक नहीं दिया जा रहा। मधु चौक सहित जिले के कई केंद्रों से लगातार शिकायतें आ रही हैं कि खाद तभी दी जाएगी जब उसके साथ लिंकिंग के अन्य सामान खरीदे जाएंगे। हैरानी की बात यह है कि जब किसान विरोध करते हैं, तो विक्रेता कंपनी का आदेश है कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। यह तर्क अपने-आप में गंभीर सवाल खड़े करता है कि क्या जिले में कंपनियों के मनमाने आदेश सरकार के नियमों से ऊपर हो गए हैं? प्रशासनिक चुप्पी इस विफलता पर मुहर लगा रही है।

कृषि विभाग की भूमिका पर सवाल इस पूरे प्रकरण में कृषि
विभाग की भूमिका संदेहास्पद और सुस्त नजर आ रही है। विभाग की जिम्मेदारी महज कागजी निरीक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करना भी है। कार्रवाई का अभाव यह दर्शाता है कि किसानों की पीड़ा तंत्र की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है। विष्णुदेव साय सरकार के लिए किसान नीति का मुख्य आधार हैं। यदि जमीनी स्तर पर अधिकारियों और व्यापारियों की सांठगांठ से नियम टूटेंगे, तो सरकार की छवि धूमिल होगी। अब समय आ गया है कि प्रशासन कठोर रुख अपनाए, दोषियों के लाइसेंस रद्द करे और खाद की पारदर्शी बिक्री सुनिश्चित करे। यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो यह दबी हुई आवाज आने वाले समय में एक बड़े जनाक्रोश का रूप ले सकती है।

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