इनमें एक करोड़ के इनामी रुपेश और 25 लाख के इनामी चैतू उर्फ श्याम दादा जैसे नाम शामिल रहे, जिनका अतीत बस्तर के जंगलों और हिंसक घटनाओं से जुड़ा रहा है। चैतू को 2013 के कुख्यात झीरम घाटी हमला का मास्टरमाइंड माना जाता है, जिसमें कई कांग्रेस नेताओं की जान गई थी। तीन महीने पहले जगदलपुर में आत्मसमर्पण करने वाला यही चैतू अब टोपी पहनकर सदन की बहस सुनता दिखाई दिया। यह दृश्य अपने आप में उस बदलाव का संकेत था, जहां बंदूक की जगह बैलेट की ताकत को स्वीकार किया जा रहा है।
विधानसभा पहुंचने से एक रात पहले इन पूर्व नक्सलियों को विजय शर्मा के नवा रायपुर स्थित निवास पर आमंत्रित किया गया। वहां औपचारिकता से अलग माहौल था लाल कालीन से स्वागत, पुष्पवर्षा और एक साथ भोजन। डिप्टी सीएम ने सभी से व्यक्तिगत बातचीत की, उनके अनुभव पूछे और रायपुर भ्रमण के सुझाव भी दिए। इस अनौपचारिक संवाद ने सरकार और पूर्व नक्सलियों के बीच भरोसे का पुल मजबूत करने का संदेश दिया।
अगली सुबह कड़ी सुरक्षा जांच के बाद सभी को विधानसभा की दर्शक दीर्घा में बैठाया गया। पहली बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया को इतने करीब से देख रहे इन लोगों के चेहरों पर उत्सुकता साफ झलक रही थी। सदन की बहस, प्रश्नकाल और विधायी प्रक्रिया को देखते हुए वे उस व्यवस्था का हिस्सा महसूस कर रहे थे, जिसके खिलाफ वे कभी खड़े थे।
पुनर्वास नीति की दिशा में बड़ा संकेत
सरकार के अनुसार अब तक 2937 नक्सली पुनर्वास नीति के तहत मुख्यधारा में लौट चुके हैं। वर्ष 2025 की नई नीति में इनाम राशि, कौशल प्रशिक्षण, जमीन, आवास और रोजगार के प्रावधान जोड़े गए हैं। सात पुनर्वास केंद्रों में 1700 से अधिक लोग प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं।