रक्षक ही बने भक्षक : राजनांदगांव के ‘फेफड़ों’ पर रेत माफिया का कब्जा, सिस्टम मौन
राजनांदगांव (दावा)। कुदरत ने राजनांदगांव को ‘ऑक्सीजोन’ के रूप में एक अनमोल सौगात दी थी एक ऐसा स्थान जहाँ शहरवासी सुकून की सांस ले सकें और बच्चे प्रकृति के करीब खेल सकें। पूर्व के जनप्रतिनिधियों ने इसे बड़े अरमानों से संवारा था, लेकिन आज वही ऑक्सीजोन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। रेत माफिया की निर्दयता और प्रशासन की संवेदनहीनता ने इस पिकनिक स्पॉट का दम घोंट दिया है। ऑक्सीजोन तड़प रहा है और बार-बार बचाने की गुहार लगा रहा है। सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बार-बार मुद्दा उठने के बाद भी वहां रेत की निर्दयता से अवैध खुदाई और बर्बादी का जो ‘शैतानी खेल’ जारी है, वह व्यवस्था की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
वोट देकर सो गई जनता,
जाग गया भ्रष्टाचार
विडंबना यह है कि जनता जिस भरोसे से प्रतिनिधियों को चुनती है, वे चुनाव जीतते ही इन विरासतों को भूल जाते हैं। नागरिकों की पाँच साल की खामोशी ही इन भ्रष्ट कारनामों के लिए खाद-पानी का काम करती है। जिस पार्क को संरक्षण मिलना था, उसे रेत माफियाओं के हवाले कर दिया गया है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में हों, तो जनता न्याय की गुहार किससे लगाए?
अधिकारी और नेताओं की ‘घातक केमिस्ट्री’
ऑक्सीजोन में चल रहा अवैध उत्खनन बिना प्रशासनिक संरक्षण के संभव नहीं है। आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारी माफियाओं के इशारों पर कठपुतली बने हुए हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष, जो सदन में एक-दूसरे के खिलाफ दहाड़ते हैं, इस मुद्दे पर रहस्यमयी चुप्पी साधे हुए हैं। यह जुगलबंदी इतनी गहरी है कि कार्रवाई के नाम पर महज छोटे-मोटे चालान काटकर खानापूर्ति कर दी जाती है, जिसके बाद माफियाओं का ‘नंगा नाच’ फिर शुरू हो जाता है।
तबाही के मुहाने पर पर्यावरण
अंधाधुंध खुदाई से न केवल ऑक्सीजोन का सौंदर्य नष्ट हो रहा है, बल्कि स्थानीय पर्यावरण को भी अपूरणीय क्षति पहुँच रही है। पर्यटन और सुकून का केंद्र अब माफियाओं का चारागाह बन चुका है। यह सांठगांठ समाज के लिए किसी जहर से कम नहीं है।
अब नहीं जागे, तो मिट जाएगा वजूद
राजनांदगांव की कई ऐतिहासिक धरोहरें पहले ही उपेक्षा की भेंट चढ़ चुकी हैं। यदि यही हाल रहा, तो ऑक्सीजोन भी सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा। यह केवल एक पार्क की बर्बादी नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की हत्या है। वक्त आ गया है कि शहर अपनी खामोशी तोड़े और इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ आवाज बुलंद करें। व्यवस्था तब बदलेगी जब हम वोट देकर सोएंगे नहीं, बल्कि जिम्मेदारों को उनकी जवाबदेही याद दिलाएंगे।



