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16 साल का इंतजार, 96 पेशियां और हाथ खाली : एसडीएम के अचानक तबादले से डोंगरगांव के किसानों में फूटा आक्रोश…

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डोंगरगांव (दावा)। छत्तीसगढ़ में कमजोर वर्ग के किसानों को भू-माफियाओं और सूदखोरों के चंगुल से बचाने के लिए बने ऋण मुक्ति अधिनियम 1976 की डोंगरगांव अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) न्यायालय में धज्जियां उड़ती दिखाई दे रही हैं। न्याय की आस में पिछले 16 वर्षों से भटक रहे पीड़ित किसानों का धैर्य अब पूरी तरह जवाब दे चुका है। पिछले 2 साल 9 महीनों में 96 पेशियां (सुनवाई) भुगतने के बाद भी जब किसानों को न्याय नहीं मिला, तो अब उन्होंने उग्र आंदोलन की अंतिम चेतावनी दे दी है।

न्यायालय के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे अनावेदक
प्राप्त जानकारी के अनुसार पीडि़त किसानों द्वारा छत्तीसगढ़ समाज के कमजोर वर्गों के कृषि-भूमिधारकों को उधार देने वालों के भूमि हड़पने संबंधी कुचक्रों से परित्राण तथा मुक्ति अधिनियम 1976 की धारा 5 सहपठित धारा 7 के तहत 12 सितंबर 2023 को भूमि वापसी हेतु याचिका दायर की गई थी। इस मामले में प्रकरण क्रमांक 202309091000034 सहित कुल 7 मामले दर्ज हैं। हैरानी की बात यह है कि करीब पौने तीन साल में इस मामले की 96 सुनवाई हो चुकी हैं और आवेदकों का प्रतिपरीक्षण भी पूरा हो चुका है। न्यायालय द्वारा अनावेदकगण को 11 मई और 25 मई 2026 को साक्ष्य प्रस्तुत करने के कड़े आदेश दिए गए थे, लेकिन अनावेदक पक्ष लगातार नियमों को ठेंगा दिखाते हुए 22 जून 2026 तक भी साक्ष्य प्रस्तुत करने नहीं पहुंचा, जो सीधे तौर पर राजस्व न्यायालय की अवहेलना है।

जांच प्रतिवेदन में जबरदस्ती जमीन रजिस्ट्री और ट्रैक्टर छीनने की पुष्टि
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि तत्कालीन तहसीलदार छुरिया और अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) डोंगरगांव द्वारा 29 अप्रैल 2014 को सौंपे गए संयुक्त प्रतिवेदन (ज्ञापन क्रमांक 3058) में यह स्पष्ट प्रमाणित पाया गया था कि सभी किसानों से उनकी इच्छा के विपरीत, डरा-धमकाकर और जोर-जबरदस्ती से जमीन की रजिस्ट्री कराई गई थी। किसानों से बलपूर्वक उनका ट्रैक्टर भी छीन लिया गया था। इस प्रतिवेदन में क्रेता (अनावेदक पक्ष) पर कठोर कानूनी कार्रवाई की अनुशंसा की गई थी, लेकिन एक दशक बाद भी कार्रवाई शून्य है।
तृतीय जिला न्यायाधीश राजनांदगांव ने व्यवहार अपील क्रमांक 7 ए/2020 में स्पष्ट निर्णय पारित किया था कि ऋण मुक्ति अधिनियम 1976 के तहत ऐसी फर्जी रजिस्ट्री को शून्य (निरस्त) करने का पूर्ण अधिकार अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) या कलेक्टर महोदय को प्राप्त है। इस निर्णय को अनावेदक पक्ष द्वारा किसी भी उच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी गई है। जिससे यह आदेश अंतिम और सर्वमान्य हो चुका है। इसके बावजूद प्रशासन अंतिम निर्णय लेने में हिचकिचा रहा है।

अंतिम फैसले से ठीक पहले एसडीएम का तबादला, संदेह के घेरे में प्रशासन
बीती 6 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान तत्कालीन एसडीएम डोंगरगांव श्री श्रीकांत कोराम ने पीड़ित किसानों को आश्वस्त किया था कि आगामी सोमवार 13 जुलाई 2026 तक इस लंबित प्रकरण का अंतिम निराकरण कर दिया जाएगा। इस आश्वासन से किसानों में न्याय की उम्मीद जागी थी, लेकिन इसी बीच 8 जुलाई 2026 को कलेक्टर कार्यालय राजनांदगांव के एक अचानक जारी आदेश (पत्र क्रमांक स्था./13786/2026) के तहत एसडीएम श्रीकांत कोराम का स्थानांतरण जिला कार्यालय राजनांदगांव कर दिया गया। अंतिम फैसले से ठीक पहले हुए इस प्रशासनिक फेरबदल से किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है और प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

किसानों का अल्टीमेटम : 13 जुलाई को आर-पार की लड़ाई
16 वर्षों से अपनी ही जमीन के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे पीड़ित किसानों ने अब कलेक्टर राजनांदगांव और अनुविभागीय अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर दो टूक चेतावनी दी है। किसानों का कहना है कि यदि आगामी सुनवाई तिथि 13 जुलाई 2026 की शाम तक उनके पक्ष में अंतिम न्यायसंगत निर्णय पारित नहीं किया जाता है, तो समस्त पीड़ित किसान अपने परिजनों और बच्चों समेत विधान कार्यालय के सामने जाकर आमरण धरना व न्याय की गुहार लगाएंगे। इस दौरान यदि किसानों या उनके परिवार को कोई भी मानसिक, शारीरिक या जान-माल की क्षति होती है, तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

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