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कलयुग में केवल हरिनाम संकीर्तन भवसागर से पार लगा देगा : आचार्य बांकेबिहारी गोस्वामी…

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राजनंदगांव । श्री अग्रसेन भवन में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के पंचम दिवस की कथा को विस्तार करते हुए व्यासपीठ पर विराजित वृंदावन के सुप्रसिद्ध भगवताचार्य बांके बिहारी गोस्वामी ने कहा कि दान सदपात्र को करना चाहिए, दान देने वाले को दान देने के पूर्व यह निर्धारित करना चाहिए कि दिया गया दान सत्कर्म , सेवाधर्म कार्य अथवा किसी व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति के लिए हो। कुपात्र को दिया दान व्यर्थ हो जाता है तथा देने वाले को पाप का भागी होना पड़ता है। सदपात्र को दिए दान का फल अवश्य प्राप्त होता है। पूज्य आचार्य श्री ने ग्रहणी को परिभाषित करते हुए कहा ग्रहणी सुशील एवं मधुर वाणी का व्यवहार करने वाली होनी चाहिए, सास-ससुर, जेठ – जेठानी, नंनद एवं बड़ों का सम्मान करने वाली होने पर वह घर को मंदिर बना देती है। अग्नि कुंड में अग्नि प्रज्वलित रहे कब आहुति देने से अग्नि वृद्धि को प्राप्त करती है, किंतु अगर अग्नि प्रज्वलित ना रहे तब आहुति देने से अग्नि प्रकट नहीं होगी। भूखे को भोजन करवाना एवं वस्त्र का दान दें यह कल्याणकारी होगा। पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि आपके द्वार पर जो याचक दान मांगने आता है, वह अपने पूर्व जन्म में दान नहीं दिए जाने के कारण इस जन्म में याचक के रूप में जन्म लेने तथा यह बताने के लिए आता है कि आप भिक्षुक को अवश्य दान देवें अन्यथा अगले जन्म में आप भी भिक्षुक के रूप में जन्म लेकर भिक्षा मांगने दर-दर भटकेंगे। द्वार पर आए भिक्षुक को अन्न एवं वस्त्र का दान अवश्य करना चाहिए। बनते कोशिश जरूरतमंद को छोड़कर अन्य को नगद दान करने से बचना चाहिए।

मकर संक्रांति पर दान की महिमा : पूज्य आचार्य श्री ने कथा विस्तार करते हुए कहा कि सनातन संस्कृति में मकर संक्रांति के दिन 14 वस्तुओं के दान करने की महत्ता प्रतिपादित की गई है । सनातन संस्कृति के अनुसार इस दिन 14 वस्तुएं परिवार की सास, जेठानी, ननंद, भांजी एवं बड़े सदस्यों को दिए जाने के साथ ही ब्राह्मण को दान दिए जाने का विधान है। परंतु आजकल देखने में आ रहा है कि हम सकाम दान धर्म कर रहे हैं जो उचित नहीं है । कलयुग की व्याख्या करते हुए आचार्य जी ने कहा कि कलयुग में परमेश्वर की प्राप्ति केवल हरि नाम संकीर्तन से ही प्राप्त हो जाती है। हरिनाम संकीर्तन, कथा, सत्संग के माध्यम से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। इसके साथ ही पुतना वध की कथा का वर्णन किया। बलराम एवं कृष्ण के नामकरण गर्गाचार्य जी द्वारा किए जाने की कथा बताई। बालकृष्ण की अनेक लीलाओं का वर्णन करते हुए माखन चोरी, गोपियों के चीर हरण करने, यशोदा द्वारा कृष्ण को उसल से बांधने का वृतांत बताते हुए कहा कि हर बार यशोदा की रस्सी दो अंगुल छोटी हो जाती है। यशोदा यह नहीं जानती जिसे वह बांधना चाहती है उसने संपूर्ण जगत को बंधनों में बांधे रखा है। उसल से बंधे कृष्ण लीला करते हुए धन के देवता कुबेर के पुत्रों नलकुबेर एवं मणिग्रीव को वृक्ष रूप से मुक्त करते हुए उनका उद्धार करते हैं।

० जैसा अर्पण करेंगे वैसा फल मिलेगा :
कथा व्यास पूज्य आचार्यश्री ने कहा कि हम जीवात्मा है, जन्म- जन्मान्तर के फल कृष्ण को अर्पित कर दें , हम जैसा अर्पण करेंगे वैसा ही फल हमें प्राप्त होगा। जैसा बीज बोएंगे वैसा ही फल प्राप्त होता है। प्रभु कृपा से समृद्धि प्राप्त हो तो धन को धार्मिक कार्यों सेवा कार्यों में खर्च करने से धन की वृद्धि होती है। हमें धन का सदुपयोग करना सीखना चाहिए । पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि पूरे विश्व में ब्रह्मा जी के दो ही मंदिर है पहला पुष्करराज में एवं दूसरा मथुरा के चौमुंहा ग्राम में है, जहां ब्रह्मा जी ने कृष्ण की परीक्षा ली थी, इन दोनों मंदिर का दर्शन कल्याणकारी होता है। पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि नंदनंदन कृष्ण की लीलाएं अनंत है।


पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि ब्राह्मण एवं देवता की पूजा करते समय उन्हें तिलक लगाया जाता है। तिलक लगाने के पश्चात चांवल ब्राह्मण एवं देवता के मस्तक के ऊपर नहीं छिड़कना चाहिए, इससे दोष लगता है। चावल ब्राह्मण एवं देवता के चरणों में छिड़का जाना चाहिए। परिवार के छोटे सदस्यों के तिलक करते समय उनके मस्तक के ऊपर चांवल छिड़का जा सकता है। कथा विस्तार करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि राधाकृष्ण की रासलीला ब्रज की विशेषता है, रासलीला की संजीव झांकी के दौरान पूरा कथा स्थल भाव भक्ति से परिपूर्ण हो गया। गोवर्धन पूजा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए पूज्य आचार्यश्री ने कहा कि एक समय घर-घर में पकवान बनते देखकर कृष्ण ने नंदलाल जी से प्रश्न किया कि आज क्या त्यौहार है तब नंदलाल जी ने बताया कि इंद्रदेव हमें वर्षा देते हैं और उसी से अनाज उत्पन्न होता है, हम इंद्रपूजा के लिए पकवान बना रहे हैं। तब भगवान कृष्ण ने इंद्र की पूजा ना करके गोवर्धन पूजा करने का विधान बताया एवं इंद्र के कुपित हो जाने से लेकर गोवर्धन पर्वत को उंगली में उठाने की कथा को विस्तार से बताया। छप्पन भोग एवं गोवर्धन की झांकी की सुंदर प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया।
प्रेषक
अशोक लोहिया

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