टाटा ग्रुप के सबसे बड़े पावर सेंटर यानी टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच की अंदरूनी जंग अब एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है जिसने पूरे भारतीय कॉर्पोरेट जगत की नींद उड़ा दी है. भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और दिग्गज वकील हरीश साल्वे ने इस पूरे ड्रामे पर ऐसा बयान दिया है जिसने सीधे बोर्डरूम की नींव हिला दी है. साल्वे का मानना है कि अगर टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट किया जाता है तो इससे न सिर्फ जवाबदेही तय होगी बल्कि पूरी व्यवस्था में क्रिस्टल क्लियर पारदर्शिता आ जाएगी. लेकिन असली सस्पेंस तो यह है कि आखिर इस लिस्टिंग का विरोध कौन कर रहा है और क्यों? साल्वे ने बातचीत के दौरान साफ इशारा कर दिया है कि लिस्टिंग का विरोध करने वालों के पीछे कोई कॉर्पोरेट एथिक्स नहीं बल्कि उनकी अपनी निजी महत्वाकांक्षाएं छिपी हो सकती हैं.
सार्वजनिक लिस्टिंग से बढ़ेगी कॉर्पोरेट पारदर्शिता
टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने को लेकर चल रही जोरदार बहस पर हरीश साल्वे ने कहा कि यदि होल्डिंग कंपनी को पब्लिक मार्केट में लाया जाता है तो इससे संस्थागत स्पष्टता और सख्त रेगुलेटरी निगरानी का फायदा मिलेगा. ऐसे में इस कदम का विरोध करने के बजाय इसका खुलकर स्वागत किया जाना चाहिए. साल्वे ने चेताया कि इतने बड़े पैमाने पर अंदरूनी खींचतान के बीच किसी कंपनी के स्ट्रक्चर को अपारदर्शी (ओपेक) बनाए रखना सीधे तौर पर कॉर्पोरेट गवर्नेंस के लिए बड़ा खतरा पैदा करता है. उन्होंने सवाल उठाया कि पब्लिक लिस्टिंग से पीछे हटने की जिद यह साबित करती है कि लीडरशिप इकोसिस्टम के भीतर कुछ लोग अपने निजी हितों को कंपनी के हितों से ऊपर रख रहे हैं.
टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने को लेकर चल रही जोरदार बहस पर हरीश साल्वे ने कहा कि यदि होल्डिंग कंपनी को पब्लिक मार्केट में लाया जाता है तो इससे संस्थागत स्पष्टता और सख्त रेगुलेटरी निगरानी का फायदा मिलेगा. ऐसे में इस कदम का विरोध करने के बजाय इसका खुलकर स्वागत किया जाना चाहिए. साल्वे ने चेताया कि इतने बड़े पैमाने पर अंदरूनी खींचतान के बीच किसी कंपनी के स्ट्रक्चर को अपारदर्शी (ओपेक) बनाए रखना सीधे तौर पर कॉर्पोरेट गवर्नेंस के लिए बड़ा खतरा पैदा करता है. उन्होंने सवाल उठाया कि पब्लिक लिस्टिंग से पीछे हटने की जिद यह साबित करती है कि लीडरशिप इकोसिस्टम के भीतर कुछ लोग अपने निजी हितों को कंपनी के हितों से ऊपर रख रहे हैं.
कास्टिंग वोट और एन चंद्रशेखरन के पुनर्नियुक्ति का सस्पेंस
बातचीत के दौरान टाटा संस के बोर्ड में एन चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और कास्टिंग वोट के इस्तेमाल से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी तीखी चर्चा हुई. क्या किसी मतभेद को दबाने के लिए कास्टिंग वोट का इस्तेमाल वैध है? इस सवाल का कड़ा जवाब देते हुए साल्वे ने कहा कि दुनिया की कोई भी कॉर्पोरेट संस्था स्थायी रूप से गतिरोध (डेडलॉक) की स्थिति में नहीं चल सकती. उन्होंने कहा कि जब बोर्ड के मतभेदों को सुलझाने के लिए कास्टिंग वोट जैसे प्रक्रियात्मक दांव-पेचों का सहारा लिया जाने लगे तो यह साफ हो जाता है कि ढांचागत कमियां कितनी गहरी हो चुकी हैं. यह बिल्कुल वही सिस्टमिक रिस्क है, जिसको लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) कोर इन्वेस्टमेंट कंपनियों (Upper-Layer CICs) को लगातार चेताता आ रहा है.
बातचीत के दौरान टाटा संस के बोर्ड में एन चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और कास्टिंग वोट के इस्तेमाल से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी तीखी चर्चा हुई. क्या किसी मतभेद को दबाने के लिए कास्टिंग वोट का इस्तेमाल वैध है? इस सवाल का कड़ा जवाब देते हुए साल्वे ने कहा कि दुनिया की कोई भी कॉर्पोरेट संस्था स्थायी रूप से गतिरोध (डेडलॉक) की स्थिति में नहीं चल सकती. उन्होंने कहा कि जब बोर्ड के मतभेदों को सुलझाने के लिए कास्टिंग वोट जैसे प्रक्रियात्मक दांव-पेचों का सहारा लिया जाने लगे तो यह साफ हो जाता है कि ढांचागत कमियां कितनी गहरी हो चुकी हैं. यह बिल्कुल वही सिस्टमिक रिस्क है, जिसको लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) कोर इन्वेस्टमेंट कंपनियों (Upper-Layer CICs) को लगातार चेताता आ रहा है.
बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी
टाटा संस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की कानूनी स्थिति और उनकी जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए हरीश साल्वे ने बेहद अहम टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि कानूनन किसी भी कंपनी के डायरेक्टर्स का यह पहला कर्तव्य है कि वे कंपनी और उसके सभी स्टेकहोल्डर्स के सर्वोत्तम हित में काम करें. वे किसी कंट्रोलिंग ट्रस्ट या किसी खास व्यक्ति के ‘कटपुतली प्रतिनिधि’ (Proxies) बनकर काम नहीं कर सकते.
टाटा संस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की कानूनी स्थिति और उनकी जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए हरीश साल्वे ने बेहद अहम टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि कानूनन किसी भी कंपनी के डायरेक्टर्स का यह पहला कर्तव्य है कि वे कंपनी और उसके सभी स्टेकहोल्डर्स के सर्वोत्तम हित में काम करें. वे किसी कंट्रोलिंग ट्रस्ट या किसी खास व्यक्ति के ‘कटपुतली प्रतिनिधि’ (Proxies) बनकर काम नहीं कर सकते.
बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी
टाटा संस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की कानूनी स्थिति और उनकी जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए हरीश साल्वे ने बेहद अहम टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि कानूनन किसी भी कंपनी के डायरेक्टर्स का यह पहला कर्तव्य है कि वे कंपनी और उसके सभी स्टेकहोल्डर्स के सर्वोत्तम हित में काम करें. वे किसी कंट्रोलिंग ट्रस्ट या किसी खास व्यक्ति के ‘कटपुतली प्रतिनिधि’ (Proxies) बनकर काम नहीं कर सकते.
टाटा संस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की कानूनी स्थिति और उनकी जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए हरीश साल्वे ने बेहद अहम टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि कानूनन किसी भी कंपनी के डायरेक्टर्स का यह पहला कर्तव्य है कि वे कंपनी और उसके सभी स्टेकहोल्डर्स के सर्वोत्तम हित में काम करें. वे किसी कंट्रोलिंग ट्रस्ट या किसी खास व्यक्ति के ‘कटपुतली प्रतिनिधि’ (Proxies) बनकर काम नहीं कर सकते.



