राजनांदगांव (दावा)। शहर कांग्रेस कमेटी के सचिव एवं अधिवक्ता शरद खण्डेलवाल ने केंद्र सरकार द्वारा आईडीबीआई बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी विदेशी कंपनी को बेचने के फैसले पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने सवाल किया कि लगातार मुनाफा कमा रहे और जनता के भरोसे पर खड़े राष्ट्रीय बैंक को चंद हजार करोड़ रुपये के लिए विदेशी हाथों में सौंपकर सरकार कैसा आर्थिक विकास करना चाहती है?
30 हजार करोड़ का मुनाफा देने वाला बैंक विदेशी हाथों में
अधिवक्ता खण्डेलवाल ने कहा कि केंद्र सरकार ने आईडीबीआई बैंक की बहुलांश हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स से जुड़ी कंपनी को 52,878 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी है। यह फैसला चौंकाने वाला है क्योंकि पिछले 5 वर्षों में इसी बैंक ने लगभग 30 हजार करोड़ रुपये का शानदार शुद्ध मुनाफा अर्जित किया है। उन्होंने कहा कि जिस वित्तीय संस्थान को आम भारतीय नागरिकों की गाढ़ी कमाई और भरोसे से खड़ा किया गया। उसे अब निजी व विदेशी नियंत्रण में दिया जा रहा है। यदि मुनाफे में चल रहे बैंक इसी तरह बिकते रहे, तो आम जनता की जमा पूंजी की सुरक्षा पर गहरा संकट खड़ा हो जाएगा।
आरक्षण समाप्त होने और सार्वजनिक संपत्तियों के क्षरण की चिंता
कांग्रेस नेता ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस सरकारों ने बैंकों की स्थापना कर उनका राष्ट्रीयकरण किया ताकि देश के अंतिम व्यक्ति तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचें, जबकि वर्तमान केंद्र सरकार सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने पर आमादा है। खण्डेलवाल ने आशंका जताई कि निजीकरण के बाद बैंक में कार्यरत व भविष्य में नियुक्त होने वाले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के युवाओं के लिए संवैधानिक आरक्षण की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा देश
देश के व्यापक आर्थिक परिदृश्य पर चिंता व्यक्त करते हुए शरद खण्डेलवाल ने कहा कि केंद्र सरकार अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर छिपा रही है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का मूल्य लगातार गिर रहा है और विदेशी निवेशक शेयर बाजार से लगातार पूंजी निकाल रहे हैं। विदेशी मुद्रा भंडार और सोने के रिजर्व में गिरावट देखी जा रही है। जबकि खुदरा महंगाई दर आम जनता की पहुंच से बाहर होती जा रही है। देश पर कुल कर्ज बढक़र लगभग 250 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जिससे प्रत्येक भारतीय पर औसतन 4.80 लाख रुपये का कर्ज भार आ चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार देश की मूल्यवान सार्वजनिक संपत्तियों को बेचकर काम चला रही है, जो भविष्य के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा।




