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मां बम्लेश्वरी देवी की पूजा-अर्चना गौड़ पद्धति से कर की देशवासियों के सुख-समृद्धि की कामना..

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0 माता के दरबार में दिखा आस्था, परंपरा और इतिहास का अद्भुत संगम
० नवरात्र पर्व के दौरान पंचमी भेंट यात्रा विधि विधान से हुई संपन्न,
० माता को भेंट की गई राजा की प्राचीन तलवार

डोंगरगढ़ (दावा)। चैत नवरात्र पर्व के दौरान पंचमी के अवसर पर इस बार आस्था, परंपरा और इतिहास एक साथ देखने को मिला। आदिवासी गोंड समाज की सदियों पुरानी पंचमी भेंट यात्रा पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ संपन्न हुई। इस बार यात्रा की सबसे खास बात यह रही कि गौड़ समाज के लोग राजकुमार भवानी बहादुर सिंह द्वारा प्रदान की गई, खैरागढ़ राजपरिवार से जुड़ी राजा की प्राचीन तलवार को लेकर माता के दरबार पहुंचे थे। इस अवसर पर गोंड समाज के सैकड़ों लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए और ढोल-नगाड़ों के साथ भेंट यात्रा निकालते हुए मंदिर पहुंचे। यह यात्रा बूढ़ादेव देव स्थल से शुरू हुई, जो गोंड समाज के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। वहां से जुलूस के रूप में लोग माता बम्लेश्वरी मंदिर पहुंचे। मंदिर पहुंचने के बाद समाज के प्रतिनिधि किशोर नेताम और बैगा ने गर्भगृह में जाकर पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और माता को भेंट अर्पित की।

गोंड समाज की आस्था और पहचान से जुड़ी, सदियों पुरानी परंपरा का निर्वाह किया गया गोंड महासभा के अध्यक्ष रमेश उइके ने बताया कि पंचमी भेंट की यह परंपरा बहुत पुरानी है और हर साल दोनों नवरात्र में इसे निभाया जाता है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा समाज की आस्था और पहचान से जुड़ी हुई है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है। जानकार बताते है कि,डोंगरगढ़ की इस परंपरा के पीछे एक दिलचस्प इतिहास भी जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि भोसले शासनकाल के समय डोंगरगढ़ के राजा घासीदास वैष्णव ने नागपुर को कर देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद नागपुर दरबार ने अपने दीवान टिकैत राय को डोंगरगढ़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया। टिकैत राय ने युद्ध में जीत हासिल की और राजा घासीदास को बंदी बना लिया। राजा घासीदास वैष्णव की वीरता से प्रभावित होकर उन्हें खैरागढ़ सहित डोंगरगढ़ का शासन सौंप दिया गया। इसी दौरान उन्हें माँ बम्लेश्वरी की प्राचीन तलवार भी दी गई, जो आज भी खैरागढ़ राजपरिवार के पास सुरक्षित है। यह तलवार धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। खास बात यह है कि इस तलवार पर माता बम्लेश्वरी की आकृति भी बनी हुई बताई जाती है।

जब गले मिले अध्यक्ष मनोज अग्रवाल व गोंड समाज के प्रतिनिधि
चैत्र नवरात्र पर्व के दौरान पंचमी भेंट के अवसर पर मां बमलेश्वरी ट्रस्ट समिति के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल और ट्रस्ट समिति के सदस्यगणों द्वारा प्रशासन की उपस्थिति में गौड़ समाज के प्रतिनिधियों का गर्भ गृह में आत्मीय स्वागत किया गया। इस दौरान दोनों एक दूसरे से गले मिलते देखे गए। जिसे दोनों ओर से सराहनीय सहयोग की दिशा में बढ़ते कदम के रूप से में देखा जा रहा है।गत क्वांर नवरात्र पर्व के दौरान भारी अव्यवस्था के बीच पंचमी भेंट का कार्यक्रम संपन्न हुआ था।और उसके बाद आरोप-प्रत्यारोप से चारों ओर गलतफहमी का वातावरण निर्मित हो गया था। जिसे प्रशासन ने बड़ी गंभीरता से लिया और पूरी तैयारी के साथ चैत्र नवरात्रि पंचमी भेंट के कार्यक्रम को संपन्न करवाया।

राज परिवार द्वारा बनाए गए ट्रस्ट के जरिए संचालित मंदिर, राजपरिवार निभा रहा परंपरा – राजकुमार भवानी बहादुर सिंह
आजादी के बाद खैरागढ़ राजपरिवार के वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने मंदिर के संचालन के लिए ट्रस्ट की स्थापना की, जो आज भी मंदिर की व्यवस्था संभालता है। राजपरिवार के राजकुमार भवानी बहादुर के अनुसार, यह तलवार सैकड़ों वर्ष पुरानी है और राजपरिवार ने इसे करीब दो सौ वर्षों से सुरक्षित रखा है। पंचमी भेंट के मौके पर इसे मंदिर लाना परंपरा का अहम हिस्सा है। इस प्रकार राज परिवार वर्षों पुरानी परंपरा को विधि विधान के साथ निभा रहा है।

एसपी अंकित शर्मा के नेतृत्व में प्रशासन ने संभाली कमान
पूरे आयोजन के दौरान प्रशासन की ओर से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा खुद मौके पर मौजूद रहीं और व्यवस्थाओं का जायजा लेती रहीं। वहीं एसडीएम एम. भार्गव (आईएएस) सहित अन्य अधिकारी भी लगातार मंदिर परिसर में मौजूद रहे। प्रशासन, ट्रस्ट और समाज के आपसी सहयोग से कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ।

प्रशासन, ट्रस्ट व गौड़ समाज के सहयोग से पंचमी भेंट का कार्यक्रम संपन्न हुआ – एसडीएम एम. भार्गव आईएएस
एसडीएम एम. भार्गव ने बताया कि पंचमी भेंट का कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है और इसमें प्रशासन, पुलिस, ट्रस्ट और समाज के लोगों का सराहनीय योगदान रहा। डोंगरगढ़ की यह पंचमी भेंट यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी गोंड समाज की आस्था, उनकी परंपरा और क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास का जीवंत उदाहरण है। हर साल यह आयोजन न सिर्फ श्रद्धा का केंद्र बनता है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और विरासत से जोडऩे का काम भी करता है।

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