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नक्सलवाद के गढ़ में बदलाव की पदयात्रा : महिलाओं ने बदली बस्तर की दहलीज की तस्वीर…

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राजनांदगांव। जिला लंबे समय से नक्सल प्रभाव और आदिवासी अंचलों की चुनौतियों से जूझता रहा है। ऐसे कठिन परिवेश में की महिलाओं ने एक ऐसा अनोखा प्रयोग किया, जिसने सामाजिक परिवर्तन की नई दिशा दिखाई। इस पहल का नेतृत्व पद्मश्री फुलवासन यादव ने किया, जबकि शिव कुमार देवांगन के देख रेख में इसे सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया गया। इस महिला पदयात्रा की शुरुआत 3 मार्च 2011 को हुई, जो प्रारंभ में 5 दिनों तक चली। बाद के वर्षों में यह एक सतत अभियान बन गई, जिसमें हर वर्ष 4-5 दिनों की यात्राएं आयोजित की जाने लगीं। इस अभियान के तहत 200 से अधिक गांवों में पहुंचकर महिलाओं ने जागरूकता का संदेश फैलाया। विशेष बात यह रही कि, यह यात्रा उन अति नक्सल प्रभावित, दुर्गम और बीहड़ आदिवासी क्षेत्रों में की गई, जहां न तो आवागमन की सुविधा थी और न ही सरकारी योजनाओं की पर्याप्त जानकारी।

मानपुर ब्लॉक के औंधी, खडग़ांव, मोहला ब्लॉक के, भोजटोला, मोहभट्टा जैसे क्षेत्रों से लेकर चौकी के चिलहटी और कोरचाटोला, छुरिया के पंडरापानी और आमगांव, खैरागढ़ के देवरी तथा छुईखदान के ठाकुरटोला जैसे इलाकों में यह पदयात्रा पहुंची। इन क्षेत्रों का चयन अपने आप में एक साहसिक निर्णय था, क्योंकि यहां सामाजिक, भौगोलिक और सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियां थीं।
इस पदयात्रा का मुख्य उद्देश्य केवल भ्रमण करना नहीं था, बल्कि समाज के मूल मुद्दों पर जागरूकता लाना था। नशा मुक्ति, स्वच्छता, स्वास्थ्य, स्वरोजगार और महिलाओं को स्व-सहायता समूहों से जोडक़र आर्थिक रूप से सशक्त बनाना इस अभियान के प्रमुख लक्ष्य था। महिलाओं को यह समझाया गया कि वे संगठित होकर न केवल अपनी स्थिति सुधार सकती हैं, बल्कि पूरे समाज को नई दिशा दे सकती हैं।
इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता जनसहभागिता रही। गांव-गांव में इस पदयात्रा का स्वागत उत्सव की तरह किया गया। महिलाएं बाजे-गाजे के साथ शामिल हुईं, अपने घरों से चावल, दाल और छोटी-छोटी आर्थिक सहायता देकर सहयोग किया। इस दौरान छुआछूत और छोटे-बड़े के भेदभाव को खत्म करने का भी सफल प्रयास हुआ। पूरा वातावरण एक सामाजिक पर्व में बदल गया, जहां एकता और सहयोग की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी। इस अभियान का प्रभाव भी अत्यंत सकारात्मक रहा। लगभग 75 प्रतिशत महिलाएं स्व-सहायता समूहों से जुडक़र मुख्यधारा में आईं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जहां भय और अलगाव का माहौल था, वहां संवाद, विश्वास और विकास की नई शुरुआत हुई। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने यह सिद्ध कर दिया कि सामाजिक परिवर्तन में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस पदयात्रा को प्रशासनिक और संस्थागत स्तर पर भी व्यापक समर्थन मिला। विभिन्न समय पर मुख्य सचिव, कलेक्टर, आईएएस अधिकारी तथा के वरिष्ठ अधिकारी, बैंकिंग संस्थानों के प्रतिनिधि, जनप्रतिनिधि और शिक्षाविद भी इसमें शामिल हुए। इस अभियान को और अधिक मजबूती देने में राजेश साहू, मधुलिका, धनेश्वरी मंडावी, जानिया, शैल, आगसिया, सुनील, विनोद, डालेशवर, ओमेश की अहम भूमिका निभाई। अंतत: यह महिला पदयात्रा केवल एक जागरूकता अभियान नहीं, बल्कि नक्सल प्रभाव को कम करने का एक प्रभावी सामाजिक मॉडल बनकर उभरी। यह पहल दिखाती है कि, यदि समाज संगठित हो, विशेषकर महिलाएं नेतृत्व संभालें, तो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक बदलाव संभव है। यह प्रयोग न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है।

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