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परिवहन विभाग के नियमों की आड़ में खेल : जबरन रेडियम और बारकोड लगाने का दबाव, वाहन मालिक परेशान…

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० बाजार से दोगुनी कीमत – निर्धारित वेंडरों द्वारा रेडियम और बारकोड के नाम पर अत्यधिक शुल्क वसूला जा रहा है।
० काम रोकने की धमकी- दबाव न मानने पर वाहनों का फिटनेस सर्टिफिकेट रोकने या प्रक्रिया को अटकाने का डर दिखाया जाता है।
० विकल्प का अभाव – वाहन मालिकों को अपनी मर्जी या खुले बाजार से मानक सामग्री खरीदने की अनुमति नहीं दी जा रही है।

राजनांदगांव (दावा)। परिवहन विभाग के नियमों की आड़ में शहर और आसपास के क्षेत्रों में वाहन मालिकों को जबरन रेडियम पट्टी और बारकोड लगाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। फिटनेस और अन्य विभागीय कार्यों के नाम पर दी जा रही इस अनावश्यक दबिश से स्थानीय वाहन मालिक और चालक बेहद परेशान हैं। वाहन मालिकों का आरोप है कि नियमों का हवाला देकर उनसे मनमानी राशि वसूली जा रही है और ऐसा न करने पर काम रोकने की धमकी दी जाती है।

फिटनेस के नाम पर मनमानी का आरोप
वाहन मालिकों का कहना है कि जब वे अपने कमर्शियल या मालवाहक वाहनों के फिटनेस और दस्तावेज संबंधी कार्यों के लिए पहुंचते हैं, तो उन पर एक विशेष वेंडर से ही रेडियम पट्टी और क्यूआर बारकोड लगवाने का दबाव बनाया जाता है। बाजार दर से कहीं अधिक कीमतों पर यह सामग्री थमाई जा रही है। वाहन चालकों का कहना है कि सुरक्षा के लिहाज से रेडियम लगाना सही है, लेकिन इसकी आड़ में जिस तरह का एकाधिकार और दबाव बनाया जा रहा है, वह पूरी तरह से गलत है।

क्विक रिस्पांस और पारदर्शिता का अभाव
शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव है। वाहन मालिकों को बिना किसी उचित रसीद या आधिकारिक दिशा-निर्देश के सीधे तौर पर मजबूर किया जाता है। यदि कोई वाहन मालिक पहले से ही मानक स्तर का रेडियम लगाकर आता है, तो भी उसे अमान्य बताकर नया बारकोड और रेडियम लेने पर विवश किया जाता है। इससे न केवल उनके समय की बर्बादी हो रही है, बल्कि उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ रहा है।

वरिष्ठ अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग
इस अव्यवस्था और जबरन बनाए जा रहे दबाव को लेकर स्थानीय ट्रांसपोर्टरों और वाहन मालिकों में भारी आक्रोश है। पीड़ित वाहन मालिकों ने जिला प्रशासन और परिवहन विभाग के उच्च अधिकारियों से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनका कहना है कि इस पूरे खेल की जांच की जानी चाहिए ताकि नियमों के नाम पर हो रही इस मनमानी और चालकों के मानसिक व आर्थिक उत्पीडऩ पर रोक लग सके।

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