रायपुर। छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोक कला ‘पंडवानी’ को वैश्विक पटल पर स्थापित करने वाली महान कलाकार और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का निधन हो गया है। वे 70 वर्ष की थीं। उन्होंने रविवार तड़के 3:15 बजे रायपुर एम्स (AIIMS) में अंतिम सांस ली。 तीजन बाई पिछले करीब 2 वर्षों से उम्र से संबंधित बीमारियों और सांस लेने की तकलीफ से जूझ रही थीं। गंभीर स्थिति के चलते उन्हें बीते 27 मई को एम्स में भर्ती कराया गया था, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी निगरानी कर रही थी।
रविवार सुबह करीब 11 बजे उनके पार्थिव शरीर को रायपुर एम्स से उनके पैतृक गांव गनियारी (भिलाई) लाया गया, जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा。
पीएम मोदी और सीएम विष्णुदेव साय ने जताया शोक
तीजन बाई के निधन पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा:
“उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में पहचान दिलायी। उनका जाना कला और संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।”
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद 1 नवंबर 2025 को तीजन बाई की बहू वेणु देशमुख को फोन कर उनके स्वास्थ्य का हालचाल जाना था और हरसंभव मदद का भरोसा दिया था।
वहीं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि तीजन बाई ने पंडवानी के माध्यम से देश और दुनिया में छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया है।

सामाजिक बंधनों को तोड़कर बनीं ‘कापालिक’ शैली की पहली महिला गायिका
24 अप्रैल 1956 को जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। पारधी समुदाय से आने वाली तीजन बाई को बचपन में अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कहानियां गाते हुए देखने से पंडवानी की प्रेरणा मिली।
मात्र 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला मंच प्रदर्शन किया। उस दौर में महिलाएं केवल बैठकर ‘वेदमती शैली’ में गाती थीं, जबकि पुरुष खड़े होकर ‘कापालिक शैली’ में प्रस्तुति देते थे। तीजन बाई ने इस रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ा और कापालिक शैली में पंडवानी गाने वाली वे पहली महिला बनीं। इस फैसले के कारण शुरुआत में उन्हें समाज से बेदखल भी होना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी कला से कभी समझौता नहीं किया।
कभी स्कूल नहीं गईं, पर मिलीं 4 मानद डी.लिट. उपाधियां
तीजन बाई बचपन में कभी स्कूल नहीं जा सकीं और बाद में साक्षरता अभियान के जरिए केवल पांचवीं तक ही पढ़ पाईं। लेकिन उनकी अद्भुत कला और लगन के चलते उन्हें 4 बार डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (D.Litt.) की मानद उपाधि से नवाजा गया।
भारतीय लोक कला में उनके अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के तीनों शीर्ष नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया था:

पद्मश्री
पद्म भूषण
पद्म विभूषण (साल 2019)
पंडवानी की इस युगप्रवर्तक आवाज के मौन हो जाने से छत्तीसगढ़ समेत पूरे विश्व के कला प्रेमियों में शोक की लहर है।



