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आधार में त्रुटि सुधार की प्रक्रिया बनी सिरदर्द, सरकारी चूक का खामियाजा भुगत रहे आम नागरिक…

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मामूली स्पेलिंग मिस्टेक के लिए भी गैजेट की अनिवार्यता से जनता परेशान, गलती सिस्टम की, जेब कट रही कार्डधारक की

राजनांदगांव (दावा)। आधार कार्ड में नाम, पता, जन्मतिथि या अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों में सुधार कराने की प्रक्रिया इन दिनों आम जनता के लिए किसी बड़ी प्रताडऩा से कम नहीं रह गई है। हाल ही में लागू हुए कड़े सरकारी नियमों के कारण अब आधार में मामूली सुधार या स्पेलिंग मिस्टेक ठीक कराने के लिए भी राजपत्र (गैजेट नोटिफिकेशन) में प्रकाशन अनिवार्य कर दिया गया है। जमीनी स्थिति यह है कि गलती चाहे सरकारी ऑपरेटर या सिस्टम के स्तर पर हुई हो, सुधार का भारी-भरकम खर्च और लंबी कानूनी प्रक्रिया का पूरा बोझ आम आदमी के कंधों पर डाल दिया गया है।

कार्ड बनाने वाले की गलती, आम जनता पर जुर्माना क्यों?
अक्सर देखा जाता है कि आधार कार्ड बनवाते समय नागरिक पूरी सावधानी बरतते हुए सही स्पेलिंग और प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध कराते हैं। इसके बावजूद, जब कार्ड प्रिंट होकर आता है, तो उसमें कई तरह की त्रुटियां (क्लैरिकल मिस्टेक) सामने आती हैं। सजग नागरिकों का सवाल है कि यदि त्रुटि कार्ड बनाने वाली एजेंसी या विभाग की तरफ से हुई है, तो इसका खामियाजा और आर्थिक दंड कार्डधारक क्यों भुगते?

हजारों का खर्चा : वकीलों और एजेंटों की चांदी
राजपत्र में प्रकाशन की अनिवार्यता ने इस पूरी व्यवस्था को बेहद जटिल और खर्चीला बना दिया है। वर्तमान में नाम या सरनेम में बड़े बदलाव के लिए 1100 रुपये से लेकर 3350 रुपये तक का सरकारी शुल्क निर्धारित है। राजपत्र प्रकाशन की प्रक्रिया आम लोगों की समझ से बाहर होने के कारण उन्हें वकीलों और एजेंटों की मदद लेनी पड़ रही है। इसके चलते एक साधारण से सुधार के लिए लोगों को 10 से 20 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।सामाजिक कार्यकर्ताओं और अंचल के प्रबुद्ध नागरिकों ने इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए सरकार और विशिष्ट पहचान प्राधिकरण से नियमों को व्यावहारिक बनाने की मांग की है। जिसमें यदि मूल नामांकन फॉर्म में आवेदक की जानकारी सही है और कार्ड में गलत छपकर आई है, तो सिस्टम की गलती मानते हुए उसे पूरी तरह नि:शुल्क सुधारा जाए। राजपत्र (गैजेट) में प्रकाशन की अनिवार्यता को उन मामलों में तुरंत हटाया जाए। जहाँ विभाग या ऑपरेटर की तकनीकी गलती साफ तौर पर उजागर हो रही हो। हर केंद्र पर नामांकन या अपडेट के समय आवेदक को उसके द्वारा भरे गए फॉर्म की एक हस्ताक्षरित प्रति (कॉपी) अनिवार्य रूप से दी जाए। यह रसीद भविष्य में नागरिक के पास इस बात का प्रमाण होगी कि उसने अपनी तरफ से सही जानकारी दी थी।

बढ़ेगा मानसिक तनाव
वर्तमान में बैंक खातों, सरकारी योजनाओं, राशन और बच्चों के स्कूल दाखिले के लिए यह कार्ड अनिवार्य दस्तावेज है। ऐसे में इसमें त्रुटि होने से लोगों के कई महत्वपूर्ण काम रुक रहे हैं। शासन-प्रशासन को इस संवेदनशील मुद्दे पर तत्काल संज्ञान लेते हुए एक जनहितैषी नीति बनानी चाहिए, ताकि नागरिकों को अपनी पहचान दुरुस्त कराने के लिए अनावश्यक आर्थिक और मानसिक प्रताडऩा से मुक्ति मिल सके।

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