मोदी सरकार के लिए काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की मांगे एक बड़ी समस्या बनी है। हताशा की गर्त में जा चुके विपक्षी दलों को उम्मीद जगी है कि पेपर लीक का मुद्दा गंभीर है, जिसे जिन्दा रख सरकार को झुकाया जा सकता हैं। सत्तासीन मोदी सरकार इस मुद्दे पर घिर जाएगी तो उसका तख्ता पलटना आसान होगा। ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा’ की तर्ज पर विपक्षी दलों को एक सुनहरा अवसर हाथ लगा है। विपक्ष और सरकार विरोधी रातोंरात मैदान में आ गए हैं। लोकतंत्र में विरोध करने वालों को सुनने की धीरज मोदी सरकार में नहीं है, यह तो दिखाई दे रहा है।
काकरोच जनता पार्टी ने देश की नई औपचारिक पार्टी होने के बावजूद सरकार का नाक दबाने तक पहुंचकर एक इतिहास बना दिया है। जो काम कांग्रेस या आम आदमी पार्टी या समाजवादी पार्टी नहीं कर सकी, उस काम को काकरोच जनता पार्टी ने कर दिखाया है।
मोदी सरकार सीजेपी पार्टी के विरोध को विरोधी दल का हथियार मानकर उसकी उपेक्षा कर रही थी। भारत के लोकतंत्र में सत्तासीन पार्टी का नेतृत्व आंदोलन को समाप्त करने में असफल रहा है। पी.एम. मोदी की फास्ट टे्रक कोर्ट में मुकदमा चलाने की बात पर भी छात्रों को सन्तोष नहीं है।
लोकतंत्र केवल चुनावों के द्वारा आधारित नहीं होता। उसकी सच्ची ताकत संवाद में निहीत है। चुनाव शक्ति तय करते हैं परन्तु, संवाद समाज-देश को एक करता है। लोकतंत्र की प्रणाली में असहमति व्यक्त करने वाले नागरिकों को संवाद के पहले बेरिकेड, कांकरिट दिवालें, तैनात पुलिस और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता है। तभी प्रश्न अब केवल कानून व व्यवस्था का नहीं, परन्तु लोकतंत्र की खुबियों का होता है।
ऐसा ही दृश्य देशवासियों ने अनेक मर्तबे देखा है। पिछले अनेक वर्षांे से यह भारतीय राजनीति का स्थायी प्रतीक बन गया है। पंजाब और हरियाणा के किसानों ने भारत-अमेरिका के प्रस्तावित व्यापार के अनुबंध का विरोध करते हुवे दिल्ली की ओर कूच किया था। उन्हें भय था कि भारत-अमेरिका के बीच करार हो गया तो उनकी खेती, बाजार और आजीविका पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। परन्तु, सरहद पर ही, संवाद के पहले उन्हें सीमेन्ट ब्लाक रख रोक दिया गया था। फिर, भारी पुलिस बल तैनात किया गया था।
ऐसे समय, सरकार का दावा रहता है कि उनके कदम कानून व व्यवस्था को बरकरार रखने उठाया गया था। जब किसान संगठनों के द्वारा आरोप लगाया कि उनका विरोध शांतिपूर्ण है। हमसे हमारा संवैधानिक अधिकार छीना जा रहा है। ऐसे दावे के बीच, भारतीय लोकतंत्र के सामने एक कठिन प्रश्न उपस्थित होता है। क्या मतभेद अब प्रशासनिक चुनौती बन गई है?
पिछले अनेक वर्षों से देखा जा रहा है कि किसी भी बड़े विरोध प्रदर्शन के पहले कलम 144 लागू की जाती है। फिर, बैरिकैड्स लगाए जाते हैं, नेताओं को गिरफ्तार किया जाता है और फिर अंत में बातचीत होती है। जबकि, लोकतंत्र में होना यह चाहिए कि, पहले बातचीत, फिर समाधान के प्रयास और अंत में जरूरी हों तो प्रशासनिक कार्यवाही होनी चाहिए।
आज सी.जे.पी. पार्टी का उग्र आंदोलन व्यापक हो रहा है। विभिन्न राज्यों में आक्रोशित विद्यार्थियों ने हिंसा का मार्ग अपनाया है। स्वाभाविक रूप से राजनीति के मद्देनजर कांग्रेस व भाजपा के कार्यकर्ता आमने-सामने हिंसा का बर्ताव कर रहे हैं। यहां असामाजिक तत्वों को भी सक्रिय देखा जा रहा है। अब तो सी.जे.पी. के नेताओं ने सरकार से बातचीत करने से भी इंकार कर दिया है। उनकी मांग अपनी शर्तें मनवानी की है। जिसमें शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा प्रमुख है। जहां तक विपक्षी दलों की बात है तो उन्होंने भी चेतावनी दे दी है कि पहले मंत्री का इस्तीफा फिर लोकसभा व राज्यसभा के सदनों में चर्चा होगी। उधर, मोदी सरकार भी उनकी शर्तों को मानने तैयार नहीं है। देश के हालात, एक तो ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण वैसे ही खराब हैं, वहां पेपरलीक मामलों का आक्रोश चरमसीमा पर है। जल्द ही यहां कोई समाधान निकालने की जरूरत है।


