Home छत्तीसगढ़ यौन अपराधों की सुनवाई में अब नहीं चलेगी आपत्तिजनक भाषा, हाईकोर्ट का...

यौन अपराधों की सुनवाई में अब नहीं चलेगी आपत्तिजनक भाषा, हाईकोर्ट का सख्त निर्देश, पीड़िता के चरित्र और निजी जिंदगी पर टिप्पणी से बचने कहा…

25
0

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में यौन अपराधों और महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों की जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया में अब पीड़ित की गरिमा और निजता का विशेष ध्यान रखा जाएगा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप पुलिस, निचली अदालतों और संबंधित सरकारी विभागों को लैंगिक रूप से संवेदनशील एवं सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल करने के निर्देश दिए हैं।

इसका उद्देश्य एफआईआर दर्ज होने से लेकर मामले के अंतिम फैसले तक ऐसी शब्दावली के इस्तेमाल पर रोक लगाना है, जिससे पीड़ित महिला की सामाजिक प्रतिष्ठा, निजी जीवन या आत्मसम्मान प्रभावित हो। न्यायिक और पुलिस दस्तावेजों में पुराने, रूढ़िवादी और आपत्तिजनक शब्दों के स्थान पर सम्मानजनक एवं कानून के अनुरूप भाषा का इस्तेमाल किया जाएगा।

पीड़ित के लिए सम्मानजनक शब्दों का इस्तेमाल

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद यौन अपराधों से जुड़े मामलों में संदर्भ के अनुसार ‘सर्वाइवर’, ‘विक्टिम’ या ‘शिकायतकर्ता’ जैसे शब्दों को प्राथमिकता दी जाएगी। ऐसी शब्दावली से बचने को कहा गया है, जो महिला के चरित्र या उसकी सामाजिक स्थिति पर सवाल खड़े करती हो।

इसी तरह ‘अस्मत’ और ‘शील भंग’ जैसे पारंपरिक शब्दों के बजाय ‘यौन हमला’ या ‘शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन’ जैसे अधिक स्पष्ट और तटस्थ शब्दों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है।

चरित्र और निजी जीवन पर टिप्पणी से बचने के निर्देश

न्यायिक प्रक्रिया के दौरान महिला के कपड़े, चरित्र या निजी जीवन को मामले के निर्णय का आधार नहीं बनाया जाएगा। अदालत का निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर ही होगा।

इसके अलावा ‘चरित्रहीन’, ‘लाचार महिला’ या ‘वेश्या’ जैसे अपमानजनक संबोधनों के इस्तेमाल से बचने के निर्देश दिए गए हैं। जरूरत के अनुसार केवल तथ्यात्मक विवरण प्रस्तुत करने और सम्मानजनक शब्दावली अपनाने पर जोर दिया गया है।

जरूरत पड़ने पर बंद कमरे में होगी सुनवाई

पीड़ितों और गवाहों को सामाजिक दबाव तथा अनावश्यक सार्वजनिक चर्चा से बचाने के लिए आवश्यक मामलों में इन-कैमरा सुनवाई की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया है। इसका उद्देश्य संवेदनशील मामलों में पीड़ित और गवाहों को सुरक्षित, गरिमापूर्ण और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना है।

24 जिला न्यायालयों समेत प्रमुख विभागों को निर्देश

हाईकोर्ट के आदेश की प्रति राज्य के सभी 24 जिला एवं सत्र न्यायालयों के अलावा गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण तथा महिला एवं बाल विकास विभाग को भेजी गई है। संबंधित संस्थानों को इन निर्देशों का तत्काल पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है।

न्यायिक और पुलिस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण कदम

यह पहल सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित पांच सदस्यीय समिति की सिफारिशों के बाद राज्य स्तर पर लागू की जा रही है। हाईकोर्ट के इस कदम को न्यायिक एवं पुलिस प्रक्रिया में लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ाने और पीड़ितों की गरिमा, निजता तथा अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here