

0 अग्रसेन भवन में भागवत कथा का चतुर्थ दिवस: श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर झूमे श्रद्धालु, वामन व मोहिनी अवतार की सजीव झांकियों ने मोहा मन
0 व्यासपीठ से हुई सनातन धर्म के नियमों एवं पितृ श्राद्ध विधान की विस्तृत मीमांसा
राजनांदगांव। स्थानीय श्री अग्रसेन भवन में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के चतुर्थ दिवस वृंदावन के सुप्रसिद्ध भागवताचार्य पं. बांकेबिहारी गोस्वामी ने भावपूर्ण कथा का रसपान कराया। उन्होंने कहा कि यह संसार एक सागर है, जिसमें हमारा शरीर नौका और मन उसकी पतवार व डोर है। जब जीव अपने मन की डोर परमेश्वर के हाथों में सौंप देता है, तो उसकी नैया कभी डूबती नहीं और सहज ही भवसागर से पार हो जाती है।
सनातन धर्म के 20 नियमों और चारों आश्रमों की व्याख्या
आचार्यश्री ने सनातन धर्म के मूल स्वरूप को रेखांकित करते हुए इसके 20 साधारण नियमों—सत्य आचरण, दया, दान, अहिंसा, स्वाध्याय, संतोष, परोपकार, प्राणी मात्र में परमात्मा का दर्शन और नवधा भक्ति का विस्तार से वर्णन किया। जीवन के चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि गृहस्थ आश्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें पारिवारिक दायित्वों का पालन करते हुए धर्म, जप-तप और भगवत भक्ति से मोक्ष की शीघ्र प्राप्ति होती है।
श्राद्ध कर्म में तिथि और नियमों का रखें विशेष ध्यान
पितृ मोक्षार्थ आयोजित इस कथा में श्राद्ध कर्म के शास्त्रीय विधान समझाते हुए आचार्यश्री ने बताया कि श्राद्ध सदैव मृत्यु तिथि के अनुसार ही करना चाहिए, अंतिम संस्कार (दाग) तिथि के अनुसार नहीं। गलत तिथि पर श्राद्ध करने से पितृ अतृप्त रह जाते हैं, जिसका दुष्प्रभाव जीवन में धनाभाव व अस्वस्थता के रूप में मिलता है। उन्होंने कहा कि एकादशी को देह त्यागने वालों का श्राद्ध द्वादशी को करना चाहिए, क्योंकि एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करना व कराना वर्जित है। उन्होंने बताया कि पितरों को गाय के दूध की खीर, तिलयुक्त जल से तर्पण और दौहित्र (नाती) द्वारा भोजन ग्रहण करना सर्वाधिक प्रिय है। श्राद्ध में उड़द दाल व तोरई की सब्जी का विशेष महत्व है, जबकि चने के बेसन का उपयोग वर्जित बताया गया है (यद्यपि बेसन के लड्डू मान्य हैं)।
धूमधाम से मना श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, सजीव झांकियों ने बांधा समां
कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए आचार्यश्री ने कच्छप, मत्स्य, गंगा अवतरण और समुद्र मंथन की अमृत कथा सुनाई। समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों और भगवान के मोहिनी स्वरूप का सुंदर वर्णन किया गया। कथा के दौरान भगवान वामन और मोहिनी अवतार की नयनाभिराम सजीव झांकियों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। जैसे ही कथा में भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का प्रसंग आया, पूरा पंडाल ‘नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की’ और ‘हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की’ के जयकारों से गूंज उठा। वसुदेव-देवकी और नन्हे बालकृष्ण की मनमोहक झांकी के दर्शन कर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूमने-नाचने लगे। कथा स्थल पर जमकर बधाइयां गाई गईं और श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद व बधाइयां बांटी गईं।


