देश की आजादी को 79 वर्ष हुए और हाल ही हमने 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। किन्तु, इतने लम्बे वर्षांेके बाद भी राष्ट्रीयता के जो संस्कार हृदय में मजबूत होने चाहिए थे, वे नहीं हुवे हैं। हमारी राष्ट्रीयता केवल भाषा में, भाषणों में और अधिक से अधिक सतही चर्चाओं में सुनने को मिलती है। विश्व में भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लेकिन, लोकतंत्र की विडम्बना यह कि सत्ता बहुत ही शक्तिशाली बन जाती है। ऐसे समय समाज प्रश्रों को पूछना बंद कर देता है। नागरिकों का मौन, यूनिवर्सिटियों का मौन और युवाओं की व्यक्तिगत सफलता पर ध्यान केन्द्रित करना, यह किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इसके विपरीत, जब युवा सिस्टम के पास से जवाब मांगते हैं, तब वह केवल विरोध नहीं है, यह लोकतंत्र की आत्मा की एक नए उथल पुथल का संकेत देती है। आज युवा, जेन जी, शिक्षा, स्पर्धात्मक, परीक्षाओं की विश्वसनीयता और रोजगार के प्रश्नों को लेकर आंदोलनरत है।
देश में भ्रष्टाचार का दायरा इतना बढ़ा है कि यह अब समग्र शासन, प्रशासन और समाज तक पहुंचा है। ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं बचा है, जहां भ्रष्टाचार ने प्रवेश न किया हो। कोई भी सरकारी काम बगैर पैसों के नहीं होता। संबंधित अधिकारियों की जेबें जब तक गर्म न हो तो जनता को दफ्तरों के चक्कर लगाने ही पड़ते हैं। ऐसे हालात में केवल एक ही विकल्प ‘‘भ्रष्टाचार का आश्रय’’ रहता है।
उत्तरप्रदेश में बुलडोजर कार्यवाही संबंधित केस में निर्णय देते हुवे इलाहाबाद कोर्ट के न्यायाधीश अतुल श्रीधर ने देश में प्रवृत्तमान भ्रष्टाचार पर तीखी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि राम मंदिर में प्रसाद की चोरी से जुड़ा हाल का ही विवाद प्रमाणिकता के पतन के शीर्ष को प्रतिबंधित करता है। भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार इतना सामान्य हो गया है कि, जब तक कोई पकड़ा न जाए, तब तक लोग उसे गलत नहीं मानते। ट्रांसपैरेन्सी इन्टरनेशनल रेकिंग में देश का स्थान भी समाज के लिए शर्मनाक नहीं है। कई मर्तबे पढ़ते हैं कि फलाना अधिकारी के निवास स्थान से करोड़ों रूपयों की नगदी, सोना-चांदी व सम्पत्तियां मिली है या कोई राजनीतिज्ञ गैरकानूनी ढ़ंग से अनुपातहीन सम्पत्तियां रखा है। महिला अधिकारी भ्रष्टाचार में फंसी है, इसके बावजुद ऐसी मान्यता है कि महिलाएं भ्रष्टाचार से दूर रहती हैं। भ्रष्टाचार को हमारे समाज ने शिष्टाचार के रूप में अपना लिया है, यह देश का दुर्भाग्य है।
भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूद करने सरकारी सूत्रों में बारम्बार ऐसा उल्लेख किया जाता है कि शीर्ष अधिकारी और अग्रणी नेता भ्रष्टाचार के सामने शून्य सहिष्णुता (जीरो टालरेंस) की नीति का दावा करते हैं, परन्तु उनकी नाक के नीचे ही भ्रष्टाचार चालू रहता है। हाल ही, जब एक अधिकारी रिश्वत लेते हुवे पकड़ा गया था, तब उसने कहा था- ‘‘मैं अकेला दोषी नहीं हूूं, यह पैसा ऊपर तक जाता है। उसका कथन सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। परन्तु, लोगों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। न्यायाधीश अतुल श्रीधर ने भ्रष्टाचार के केसों में दोषियों को मृत्युदंड देने का विचार सूचित किया है।
आजादी के 80 वें वर्ष में हमने प्रवेश तो कर लिया है किन्तु महंगाई, यू.एस. टेरिफ संबंधित नई कठिनाइयों ने भारतीय अर्थतंत्र को चिन्ताग्रस्त कर दिया है। हाल ही, आर.बी.आई. की बैठक के बाद देश में महंगाई, आर्थिक स्थिति और जीडीपी के ग्रोथ रेट का वास्ततिक चित्र प्रस्तुत किया है। इस बैठक में संकेत दिया गया था कि, आगामी समय में देश के अर्थतंत्र के लिए चुनौतीपूर्ण रहने वाला है।
सबसे महत्वपूर्ण, कृषि क्षेत्र में टेक्नालाजी का उपयोग बढ़ाने का है। जल संचय, फसल वैविध्यकरण और प्राइज स्टेबिलाईजेशन फण्ड द्वारा कृषि क्षेत्र को कमजोर मानसून के जोखिम से बचाना होगा। नई टेक्नालाजी तथा नए रोजगारों के द्वारा युवा वर्ग को इस क्षेत्र में आकर्षित करके भारत में टेक्नालाजी आधारित हरित क्रान्ति करने की महती आवश्यकता है।
ग्रामीण अंचलों में शिक्षा दयनीय स्थिति में है। कहीं शिक्षकों की कमी, जर्जर स्कूलों ने देश की नींव सदृश्य प्राथमिक, मीडिल स्कूलों की शिक्षा पर प्रश्न लगा दिया है।
ये सभी देशव्यापी प्रदूषण विनाश के राजमार्ग हैं। जिसे देश के नागरिकों ने ही पसंद किया है। हमारे अमूल्य वोट पहले तो ऐसे नहीं थे। हमारा सुयोग्य चयन ही हमारा भविष्य तय करता है। जनता को गुमराह कर, मुख्य मुद्दों से ध्यान हटाकर ओछी राजनीति करना इसे नैतिकता की पराकाष्ठा ही कहना चाहिए।


