राजनांदगांव । प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अपने माता-पिता , छोटे भाई-बहन की देखभाल करना , उनकी सेवा करना परमधर्म है । जो व्यक्ति समर्थवान होने पर भी उनके लिए भोजन , वस्त्र आदि की व्यवस्था नहीं करता तथा बुजुर्ग माता-पिता का सम्मान कर उनके पास बैठकर हाल-चाल नहीं सुनता वह व्यक्ति पाप का भागी होता है। जो स्त्री अपनी सास-जेठानी एवं ननंद के साथ ही अपने बड़ों का सम्मान करती है वह जीवन में सुख प्राप्त कर पुण्य की भागी होती है ।

० प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है : कंस वध के पश्चात भगवान कृष्ण-बलराम कारागार में देवकी – वासुदेव के समीप जाते हैं एवं प्रणाम कर कहते हैं कि आपके प्रारब्ध की वजह से आपको यह दुख सहना पड़ा है । पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि हमारे द्वारा किए गए सभी कर्मों का फल हमें प्राप्त करना ही पड़ता है। इसीलिए सदैव सत्कर्म के मार्ग पर चलें । जिससे अगला जन्म सफल हो सके ।
० माता का स्थान एक हजार पिता से भी ऊंचा है : माता-पिता की व्याख्या करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि दस शिक्षक पर एक प्रधानाचार्य होता है , सौ प्रधानाचार्य से ऊपर एक पिता का स्थान है । वही एक हजार पिताओं के ऊपर एक माता का स्थान होता है । पुत्र का धर्म है कि पिता की मृत्यु पर उसे कंधा देकर सनातन संस्कृति के अनुरूप उनका अंतिम संस्कार करें एवं पिंडदान करें । माता-पिता अपने पुत्र के पहले गुरु होते हैं । गया श्राद्ध कर्म करना भी पुत्र का दायित्व है ।
पूज्य आचार्य श्री ने कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए कहा कि गुरु जीवन को प्रकाशवान कर देता है । जिस प्रकार धोबी कपड़े को धोकर निर्मल कर देता है, उसी तरह गुरु ज्ञान के प्रकाश से शिष्य के पाप रूपी अंधकार को दूर कर निर्मल कर देता है । संसार को ज्ञान देने के लिए भगवान कृष्ण जी गुरु आश्रम जाकर गुरु महर्षि सांदीपनी से शिक्षा ग्रहण करते हैं ।
० गुरुदक्षिणा की महत्ता : गुरु दक्षिणा का महत्व बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि गुरु को दक्षिणा देना परम आवश्यक है । बिना गुरुदक्षिणा के गुरु ज्ञान स्थित नहीं रहता । भगवान कृष्ण ने भी गुरु सांदीपनी के पुत्र पुनर्दत्त को यमराज से वापस लाकर गुरुदक्षिणा प्रदान की थी । अभिमान शून्य होकर गुरु की शरण में जाकर आशीर्वाद मांगे , तो प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण में भगवत कृपा प्राप्त हो जाएगी । जिसके जीवन में छल – कपट – दुर्व्यवहार का वास हो जाएगा उसका जीवन दुखित होगा । हम प्रभु से कामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद मांगते हैं, जो उचित नहीं है , हमें तो स्वयं श्याम सुंदर को मांगना चाहिए । जिसके पास स्वयं परमेश्वर होगा उसे कभी किसी सांसारिक वस्तु की आवश्यकता ही नहीं होगी , एवं उसका मोह भंग हो जाएगा।
पूज्य आचार्य श्री ने कृष्ण के अनन्य सखा एवं चचेरे भाई उद्धव के अभियान को दूर करने के लिए गोपियों को ज्ञान एवं योग का उपदेश देने के उद्देश्य से बृज भेजा । उद्धव देवगुरु बृहस्पति के शिष्य है जिनका उन्हें अभियान था । गोपियों के निश्छल प्रेम एवं भक्ति को देखकर उद्धव का ज्ञान अभियान टूट गया । उद्धव – गोपी संवाद की सजीव झांकी ने कथा स्थल में उपस्थित भक्तों को भाव विभोर कर दिया । कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि कौवा अपने अंडों को सहेजता है, पर अंडे जैसे ही बढ़ते हैं और कौवे का रूप धारण करते हैं वह उसे छोड़कर उड़ जाते हैं । इसी तरह भंवरा जब तक पुष्प में रस रहता है उस पर बैठता है फिर वह रस चूसने के बाद उस पुष्प पर नहीं बैठता । हमें भी परिवार के सगे संबंधियों के साथ उतना ही प्रेम रखना चाहिए एवं उनसे आसक्ति नहीं रखनी चाहिए । मन को एकाग्र चित् कर प्रभु की शरण में जावे तो जब भी उसे पुकारो, वह सामने आ जाएगा । उद्धव ब्रज से वापस आकर कृष्ण से कहते हैं कि, हे कृष्ण अगर मैं अगले जन्म में मनुष्य बनूं तो मुझे ग्वाल – बाल बनाना , पशु बनूं तो नंद बाबा की गौ बनाना , पक्षी बनूं तो ब्रज की रज में विचरण करने का सौभाग्य देना , अगर पाषाण बनूँ तो गोवर्धन की शिला बना देना जिससे ब्रज के आनंद को मैं प्राप्त कर सकूं ।
कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि कृष्ण – राधा एक प्राण दो देह है , दोनों अलग नहीं है । मन बुद्धि चित् से श्याम सुंदर को सजाओ यही कल्याण का सरल मार्ग है ।
पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि हमारा जीवन आज है कल नहीं रहेगा । अतः किसी के प्रति द्वेष – बैर भावना ना रखें । अच्छा व्यवहार रखें तो वही हमारे साथ जावेगा। धन यही रह जाएगा । पत्नी द्वार तक , सगे संबंधी शमशान घाट तक ही साथ देंगे ।
पूज्य आचार्य श्री ने रुक्मणी विवाह प्रसंग की सुंदर विवेचना की । देवी रुक्मणी गौरी पूजन हेतु गई थी वहीं से कृष्ण ने उसे हरण कर लिया एवं मुख्य पटरानी का स्थान प्रदान किया भगवान कृष्ण की आठ पटरानियों का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि द्वितीय पटरानी सत्यभामा , तीसरी जांबवती, चौथी कालिंदी , पांचवी मित्रवृंदा , छठवीं सत्या, सातवीं भद्रा एवं आठवीं लक्ष्मणा ( माद्री ) हुई है । रुक्मणी विवाह प्रसंग की सजीव झांकी के मध्य ढोल – नगाड़े के साथ बाराती नाचते कूदते कथा मंडप में प्रवेश किए, वरमाला प्रसंग के साथ ही भगवान कृष्ण – रुक्मणी ने आपस में एक दूसरे के गले में वरमाला डाली एवं रुक्मणी विवाह संपन्न हुआ ।
प्रेषक :
अशोक लोहिया



