० इलाज के नाम पर चल रहा था व्यावसायिक खेल, तालाब, भवन और खेत दिए गए थे ठेके व किराए पर
० 43 साल तक छिपाई गई जानकारी, 23 एकड़ परिसर में सालभर में मिले औसतन मात्र 3 मरीज
० नंदई स्थित बेशकीमती जमीन शासन के खाते में दर्ज, तहसीलदार को 7 दिन में कब्जा लेने का फरमान
राजनांदगांव (दावा)। शासकीय भूमि के दुरुपयोग और लीज शर्तों के घोर उल्लंघन पर जिला प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए ऐतिहासिक कार्रवाई की है। ग्राम नंदई स्थित 22.90 एकड़ बेशकीमती शासकीय भूमि की लीज डीड को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया है। कुष्ठ रोगियों के नि:शुल्क उपचार और पुनर्वास के नाम पर आवंटित इस विशाल भूखंड का उपयोग व्यावसायिक लाभ कमाने के लिए किया जा रहा था। प्रशासन ने विस्तृत आदेश पारित कर संपूर्ण भूमि को पुन: छत्तीसगढ़ शासन के आधिपत्य में निहित कर लिया है।
बिना अनुमति कब्जा हस्तांतरण और फर्जीवाड़ा
प्रशासनिक जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि मूल लीजधारी संस्था की जगह किसी अन्य संस्था का कब्जा था। जिसका पंजीयन वर्ष 1993 में हुआ था। लीज नियमों के अनुसार बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के भूमि का हस्तांतरण या किसी अन्य को कब्जा सौंपना पूर्णत: प्रतिबंधित था। बावजूद इसके नियमों को ताक पर रखकर न सिर्फ जमीन पर अवैध कब्जा रखा गया। बल्कि इलाज की आड़ में भारी आर्थिक मुनाफा कमाया जा रहा था। लगभग 43 वर्षों से इन गतिविधियों की जानकारी प्रशासन से छिपाई रखी गई।
23 एकड़ में मिले महज 3 मरीज, बाकी में कमर्शियल खेल
संस्था की वित्तीय वर्ष 2024-25 की सीए ऑडिट रिपोर्ट ने फर्जीवाड़े की कलई खोलकर रख दी। 22.90 एकड़ के विशाल परिसर में पूरे सालभर में औसतन मात्र 3 मरीज ही इलाजरत पाए गए। वहीं मरीजों के उपचार को लेकर संस्था प्रबंधन कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। जांच में स्पष्ट हुआ कि जनसेवा केवल दिखावा थी और मुख्य उद्देश्य परिसर का व्यावसायिक दोहन करना था।
तालाब, कृषि भूमि और मकानों से वसूली जा रही थी कमाई
जांच टीम को परिसर में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित मिलीं। जिसमें परिसर के भीतर स्थित लगभग 1.50 एकड़ के तालाब को मछली पालन के लिए बाकायदा ठेके पर दिया गया था। उपजाऊ कृषि भूमि को निजी किसानों को रेघा (बटाई/ठेके) पर देकर मोटी रकम वसूली जा रही थी। परिसर में बने पक्के भवनों और रिहायशी क्वार्टरों को रेंट एग्रीमेंट के जरिए बाहरी व्यक्तियों को किराए पर दिया गया था।
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट बनी आधार
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) के प्रतिवेदन में स्पष्ट किया गया कि राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम के तहत शासन स्वयं घर-घर जाकर और अस्पतालों के जरिए कुष्ठ रोगियों को नि:शुल्क दवाइयां व उन्नत चिकित्सा मुहैया करा रहा है। ऐसे में इस संस्था की कोई उपयोगिता शेष नहीं रह गई थी। छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 के प्रावधानों और लीज की शर्त क्रमांक 1 व 2 के सीधे उल्लंघन के आधार पर प्रशासन ने लीज निरस्तीकरण का कड़ा फैसला लिया।
7 दिन में भौतिक कब्जे का अल्टीमेटम
जिला प्रशासन ने तहसीलदार राजनांदगांव को राजस्व अभिलेखों से संस्था का नाम विलोपित कर छत्तीसगढ़ शासन दर्ज करने तथा 7 दिनों के भीतर 22.90 एकड़ भूमि का भौतिक कब्जा लेने का सख्त आदेश दिया है। इसके साथ ही संवेदनशीलता बरतते हुए परिसर में मौजूद वर्तमान मरीजों के सुरक्षित पुनर्वास, भोजन, आवास और नि:शुल्क इलाज की मुकम्मल व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सीएमएचओ को सौंपी गई है।



