० आखिर ऐसा क्या है ठेकेदार में कि अधिकारी और नेता बचाने में लगे?
० रोड के काले-पीले को अब सफेद (मार्किंग) करने में जुटा ठेकेदार
० 18 करोड़ की लागत से बन रही साढ़े तीन किमी की सडक़ में गुणवत्ता नदारद, बनते-बनते ही लगाना पड़ रहा पैचवर्क
डोंगरगांव (दावा)। नगर में बन रही करोड़ों रुपये की निर्माणाधीन सडक़ शुरू से ही विवादों के घेरे में रही है। लगभग 18 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली साढ़े तीन किलोमीटर की इस सडक़ में अनगिनत खामियां सामने आ चुकी हैं। जिसे समय-समय पर समाचारों के माध्यम से शासन-प्रशासन के संज्ञान में लाया गया है। इसके बावजूद जनता के पैसों का नुकसान करने वाले ठेकेदार के काम में न तो कोई सुधार आया और न ही विभाग द्वारा अब तक कोई कड़ा एक्शन लिया गया। स्थानीय नेताओं और संबंधित अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किस हित के लिए घटिया निर्माण करने वाले ठेकेदार लेखराम साहू को बार-बार जीवनदान दिया जा रहा है और ब्लैकलिस्ट करने से बचा जा रहा है।
धूल-मिट्टी के ऊपर ही आड़ी-तिरछी मार्किंग
हाल ही में सडक़ किनारे सफेद पट्टी (मार्किंग) खींचने का काम शुरू किया गया। नगर के जागरूक नागरिकों द्वारा शिकायत मिलने पर जब मीडिया टीम मौके पर पहुंची, तो देखा कि डिवाइडर के दोनों ओर धूल-मिट्टी को बिना साफ किए ही जल्दबाजी में मार्किंग की जा रही थी। काम कर रहे मजदूरों ने बताया कि उन्हें ठेकेदार की ओर से जैसा निर्देश मिला है, वे वैसा ही कर रहे हैं। नियमविरुद्ध बेहद पतली लेयर और आड़ी-तिरछी मार्किंग से साफ झलकता है कि काम में केवल खानापूर्ति की जा रही है।
मामले की शिकायत जब पीडब्ल्यूडी के कार्यपालन अभियंता एस.के. चौरसिया तक पहुंची तो उन्होंने कर्मचारियों को काम बंद कराने के निर्देश दिए। विभागीय कर्मचारी मौके पर पहुंचे और काम रोकने की हिदायत देकर चले गए। लेकिन उनके जाते ही ठेकेदार ने फिर से घटिया काम चालू करवा दिया।
18 करोड़ की चमचमाती सडक़ की जगह दिखा लीपापोती का खेल
साढ़े तीन किलोमीटर की इस सडक़ में गुणवत्ता के नाम पर कुछ नहीं है। सडक़ की सतह कई जगहों से दब गई है और बनते-बनते ही पैचवर्क (मरम्मत) की नौबत आ गई है। सुसज्जित डिवाइडर और पाथ-वे का दूर-दूर तक अपता-पता नहीं है। घटिया मटेरियल के इस्तेमाल से बनी इस सडक़ को देखकर ऐसा लगता है कि 18 करोड़ रुपये का केवल कागजी लीपापोती किया गया है। नागरिकों का कहना है कि इस घटिया निर्माण के लिए ठेकेदार के साथ-साथ मूकदर्शक बने अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी बराबर के जिम्मेदार हैं।



